-हिमालय : भारत-चीन-नेपाल और भूटान के बीच बने ‘प्राकृतिक रक्षा-बन्धन’
-क्या साझा हिमालयी सुरक्षा क्षेत्र से खुलेगा सहयोग का नया अध्याय?
आलेख:दीपक कुमार तिवारी।
हिमालय को यदि केवल बर्फ से ढके पहाड़ों की एक लंबी श्रृंखला मान लिया जाए, तो शायद हम उसकी वास्तविक भूमिका को समझने में चूक जाएंगे। हिमालय केवल पर्वत नहीं है, बल्कि एशिया की जीवनधारा है। यहां से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों के जीवन, कृषि, अर्थव्यवस्था और सभ्यता को आधार देती हैं। भारत, नेपाल, भूटान और चीन का तिब्बती भूभाग हिमालय के इसी विशाल पारिस्थितिक तंत्र से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है।
आज हिमालय तेजी से बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमनदों के पिघलने की गति बढ़ रही है। हिमतालों का आकार बढ़ रहा है। अचानक बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएं बढ़ती चिंता का विषय बन रही हैं। पहाड़ों में होने वाली एक प्राकृतिक घटना कुछ ही घंटों या दिनों में हजारों किलोमीटर दूर बसे मैदानी क्षेत्रों के लिए संकट पैदा कर सकती है।
यही वह परिस्थिति है, जहां भारत, चीन, नेपाल और भूटान के बीच एक नए प्रकार के ‘रक्षा-बन्धन’ की आवश्यकता महसूस होती है। यह रक्षा-बन्धन सैनिक गठबंधन का नहीं, बल्कि प्रकृति, विज्ञान और मानवता की रक्षा का होना चाहिए।
हिमालय की सबसे बड़ी विशेषता ही उसकी सीमाहीन प्रकृति है। किसी हिमताल का फटना यह नहीं देखता कि उसके नीचे बहने वाली नदी किस देश की सीमा में प्रवेश कर रही है। बादल फटने से निकलने वाला पानी पासपोर्ट लेकर सीमा पार नहीं करता। भूस्खलन सीमा चौकी पर रुकता नहीं है। नदी का बहाव राजनीतिक सीमाओं का सम्मान नहीं करता।
नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में होने वाली भारी वर्षा या हिमनद से जुड़ी कोई बड़ी घटना कोशी, गंडकी और कर्णाली जैसी नदियों के माध्यम से भारत के तराई और मैदानी क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है। इसी प्रकार तिब्बती क्षेत्र में होने वाली प्राकृतिक घटनाओं का असर नीचे बसे नेपाल, भूटान और भारत तक पहुंच सकता है।
जब संकट की प्रकृति सीमाहीन है, तो उसके समाधान की व्यवस्था भी सीमापार सहयोग पर आधारित क्यों न हो?
भारत और चीन के पास आधुनिक उपग्रह प्रणालियां, रिमोट सेंसिंग, मौसम विज्ञान और आपदा प्रबंधन की महत्वपूर्ण क्षमताएं हैं। नेपाल और भूटान हिमालय के अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों में स्थित होने के कारण जमीनी स्तर के अनुभव और स्थानीय परिस्थितियों की महत्वपूर्ण समझ रखते हैं। यदि इन चारों देशों की क्षमताओं और अनुभव को एक साझा मंच पर लाया जाए, तो हिमालयी आपदा प्रबंधन का एक प्रभावी और विश्वस्तरीय मॉडल तैयार किया जा सकता है।
इसके लिए सबसे पहले हिमनदों और हिमतालों की साझा निगरानी आवश्यक है। किसी हिमताल में असामान्य बदलाव दिखाई देने पर संबंधित देशों के बीच तत्काल वैज्ञानिक सूचना का आदान-प्रदान होना चाहिए। ऐसी सूचना केवल राजनयिक चैनलों तक सीमित न रहे, बल्कि संबंधित प्रशासन, आपदा प्रबंधन एजेंसियों और स्थानीय समुदायों तक शीघ्र पहुंचनी चाहिए।
इसी प्रकार बाढ़ और भूस्खलन के लिए एक साझा पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित की जा सकती है। मौसम संबंधी आंकड़े, उपग्रह चित्र, नदी के जलस्तर और हिमनदों से जुड़ी सूचनाएं साझा करने की व्यवस्था लाखों लोगों की जान बचा सकती है।

लेकिन इस विचार के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक अविश्वास मौजूद है। दोनों देशों के बीच भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी एक वास्तविकता है। नेपाल और भूटान अपने राष्ट्रीय हितों, संप्रभुता और सुरक्षा प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाते हैं। ऐसे में चारों देशों के बीच व्यापक हिमालयी सहयोग स्थापित करना आसान नहीं होगा।
फिर भी प्राकृतिक आपदाओं के सामने राजनीतिक मतभेदों को मानवीय सहयोग के रास्ते में बाधा नहीं बनना चाहिए। आपदा के समय यह मायने नहीं रखता कि पीड़ित व्यक्ति किस देश का नागरिक है। उस समय जीवन बचाना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है।
नेपाल इस संभावित हिमालयी सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। नेपाल का विशाल हिमालयी क्षेत्र जलस्रोतों, हिमनदों और प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। नेपाल को भारत और चीन के सामने यह बात मजबूती से रखनी चाहिए कि हिमालय से जुड़ी महत्वपूर्ण प्राकृतिक सूचनाएं केवल सामरिक संपत्ति नहीं हैं, बल्कि वे मानव जीवन की सुरक्षा से जुड़ी सार्वजनिक संपत्ति हैं।
हालांकि नेपाल को केवल दूसरे देशों से सूचना प्राप्त करने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। उसे अपनी हिमनद निगरानी, मौसम विज्ञान, रिमोट सेंसिंग, आपदा पूर्वतैयारी और स्थानीय समुदाय आधारित चेतावनी प्रणालियों को भी मजबूत करना होगा।
भूटान का अनुभव भी इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। हिमताल विस्फोट और जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों का सामना कर रहे हिमालयी देशों के बीच अनुभवों का आदान-प्रदान भविष्य की आपदाओं से निपटने की क्षमता बढ़ा सकता है।
लेकिन ‘हिमालयी सुरक्षा’ के नाम पर सैन्यीकरण बढ़ना इस पूरी अवधारणा की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो सकता है। यदि प्राकृतिक सुरक्षा के नाम पर सीमा पर सैनिकों की संख्या, सैन्य प्रतिष्ठानों और निगरानी तंत्र का विस्तार ही प्राथमिकता बन जाए, तो हिमालय सहयोग का क्षेत्र बनने के बजाय फिर से शक्ति-प्रतिस्पर्धा का मैदान बन सकता है।
हिमालय को सबसे अधिक आवश्यकता वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, जल विशेषज्ञों, मौसम वैज्ञानिकों, आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों और स्थानीय समुदायों की साझेदारी की है।
इस सहयोग की सबसे महत्वपूर्ण शर्त पारदर्शिता होनी चाहिए। हिमनदों, नदियों और जलस्रोतों से जुड़ी महत्वपूर्ण सूचनाओं को राजनीतिक स्वार्थ के कारण रोकना भविष्य में बड़े मानवीय संकट को जन्म दे सकता है। प्राकृतिक आपदा से संबंधित सूचना जितनी जल्दी साझा होगी, उतने अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकेगा।
आखिरकार किसी भी समझौते की वास्तविक परीक्षा कागज पर नहीं, बल्कि संकट के समय होगी। जब कोई हिमताल अचानक फटेगा, जब बादल फटेगा, जब नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ेगा और हजारों लोगों का जीवन खतरे में होगा, तब यह देखा जाएगा कि चारों देशों के बीच सूचना कितनी तेजी से पहुंचती है, चेतावनी कितनी प्रभावी होती है और सीमापार सहायता कितनी शीघ्र उपलब्ध होती है।
इसलिए आज जरूरत किसी पारंपरिक सैन्य गठबंधन की नहीं, बल्कि ‘हिमालयी प्राकृतिक सुरक्षा समुदाय’ की अवधारणा विकसित करने की है।
सीमाएं राजनीतिक होती हैं, लेकिन प्रकृति राजनीतिक नहीं होती। बाढ़ का पानी राष्ट्रीयता नहीं पूछता। हिमनद पासपोर्ट नहीं समझते। बादल वीजा नहीं मांगते। भूस्खलन सीमा चौकी पर नहीं रुकता और आपदा पीड़ित से उसकी जाति, धर्म या राष्ट्रीयता नहीं पूछती।
भारत, चीन, नेपाल और भूटान यदि हिमालय की रक्षा के लिए एक-दूसरे का हाथ थामते हैं, तो यह वास्तव में एक ऐतिहासिक ‘रक्षा-बन्धन’ होगा। लेकिन इस रक्षा-बन्धन का धागा सैन्य शक्ति का नहीं, बल्कि विज्ञान, विश्वास, पारदर्शिता, पर्यावरण और मानवता का होना चाहिए।
हिमालय सुरक्षित रहेगा तो नदियां सुरक्षित रहेंगी। नदियां सुरक्षित रहेंगी तो मैदान सुरक्षित रहेंगे। और प्रकृति सुरक्षित रहेगी तो इन चारों देशों के करोड़ों लोगों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।
















