-छठ महापर्व को लेकर सजा मिट्टी के चूल्हों का बाजार, 500 रुपये जोड़ी बिक रहे चूल्हे
-दारोगा राय पथ पर सड़क के डिवाइडर पर सजे चूल्हे कर रहे ग्राहकों का इंतजार
-महंगाई के बीच कुम्हार महिलाओं के सामने मुनाफे की चुनौती
पटना/ललितेश्वर। लोक आस्था के महापर्व छठ को लेकर बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। व्रती और उनके परिजन पर्व की तैयारियों में जुट गए हैं। इसी के साथ छठ पूजा में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक मिट्टी के चूल्हों की बिक्री भी तेज हो गई है। पटना के दारोगा राय पथ पर सड़क के डिवाइडर पर मिट्टी से बने चूल्हे बिक्री के लिए सजाए गए हैं। वहीं सड़क किनारे महिलाएं चूल्हे तैयार करने में जुटी दिखाई दे रही हैं।

छठ महापर्व में स्वच्छता और पवित्रता का विशेष महत्व है। इसी परंपरा के तहत खरना का महाप्रसाद और भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए बनाए जाने वाले पकवान मिट्टी के चूल्हे पर ही तैयार किए जाते हैं। इसके लिए जलावन के रूप में आम की लकड़ी और गाय के गोबर से बने गोइठे का इस्तेमाल किया जाता है।
दारोगा राय पथ पर चूल्हे बनाकर बेचने वाली महिलाओं ने बताया कि महंगाई के कारण इस पारंपरिक रोजगार में मुनाफा कम हो गया है। एक महिला ने बताया कि दो दिनों में मुश्किल से दस चूल्हे तैयार कर पाती हैं। मिट्टी का चूल्हा 500 रुपये जोड़ी बिकता है। चूल्हा बनाने के लिए मिट्टी छह हजार रुपये प्रति ट्रैक्टर और पुआल की कुट्टी एक हजार रुपये प्रति मन यानी 40 किलो की दर से खरीदनी पड़ती है। एक चूल्हा तैयार करने में करीब 100 रुपये की लागत आती है।
महिलाओं ने बताया कि कार्तिक छठ के दौरान तैयार चूल्हे नहीं बिक पाते हैं तो उन्हें चैती छठ तक इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में सीमित बिक्री और बढ़ती लागत के बीच इस पारंपरिक रोजगार को चलाना चुनौती बनता जा रहा है। इसके बावजूद महिलाएं पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को अपने श्रम के दम पर जीवित रखे हुए हैं।











