-अत्यधिक ठंड एवं शीतलहर के बीच बारिश ने बढ़ाया किसानों की चिंता, आलू-मक्का के फसल ठिठके;बढ़ा झुलसा का खतरा
दीपक कुमार तिवारी।मुजफ्फरपुर।
लगातार शीतलहर के बीच प्रखंड एवं आसपास के क्षेत्रों में मंगलवार की सुबह फूहरेदार बारिश हुई।इस बीच हार कम्पाती ठंड भी लगातार जारी है। दिन में धूप का निकलना भी लगभग बंद है। ऐसे में आलू एवं मक्का की फसलों पर झुलसा रोग का चपेट बढ़ने की आशंका है। इस बीच विभिन्न क्षेत्रों में आलू एवं मक्का की फसलें ठिठक गई हैं। फसलों का विकास रुक गया है।जिससे फसल उत्पादन क्षमता प्रभावित होने की आशंका से किसान चिंतित है। बन्दरा में किसान सलाहकार अनिल कुमार ने बुधवार को बताया कि जैसे ऐसी से बाहर अचानक धूप में निकलने पर लोग लू के चपेट में आ जाते हैं। ऐसे ही शीतलहर और अत्यधिक ठंड के बाद अचानक तेज धूप निकलने पर आलू एवं मक्का की फसलों को सीधा नुकसान होता है। उन्होंने बताया कि अत्यधिक ठंड का प्रभाव फसलों पर पड़ रहा है। वही इस संबंध में जिले के सहायक निदेशक,पौधा संरक्षण राधेश्याम कुमार ने बताया कि ठंड का 10 डिग्री तापमान से नीचे आना, लगातार शीतलहर का रहना और इस बीच ठंड के बीच बारिश का होना आलू एवं मक्का के फसलों के लिए नुकसानदायक है।

इस बीच यदि धूप निकलना शुरू हो जाए तो खतरा दुगुना हो जाएगी। उन्होंने बताया कि ठंड से तापमान में कमी होती है। बूंदाबांदी या बारिश होती है तो ऐसे में फंगस एक्टिव हो जाता है। धूप होते ही पता झुलस जाता है। जिससे आलू एवं मक्का की फसल को व्यापक नुकसान पहुंचता है।फंगस पत्तों में एक्टिव होने के कारण से पत्तों में छिद्र हो जाता है। बाद में यह पौधे के कंठ में पहुंच जाता है और सीधे तौर पर फसल चौपट हो जाते हैं। उन्होंने बताया सामयिक बचाव के उपाय किए जा सकते हैं। वैज्ञानिकों के सलाह से आवश्यक दवाओं का छिड़काव फसलों पर किया जाना चाहिए। ऐसे समय में फसलों के प्रति किसानों को सतर्क रहने एवं सामयिक दवाओं के स्प्रे करने की जरूरत है।
अधिकारी ने किया निरीक्षण,देखी फसलों की स्थिति:
ऐसे में सरसों में लाही व आरा मक्खी कीट लगने की संभावना भी रहती है। सहायक निदेशक(पौधा संरक्षण)राधेश्याम कुमार ने बताया कि जिले के सकरा, मुरौल, गायघाट बंदरा आदि प्रखंडों की विभिन्न पंचायतों में झुलसा रोग का प्रकोप दिखना शुरू हो गया है. यह रोग दो प्रकार का होता है. झुलसा और पिछात झुलसा। जिससे सतर्कता एवं त्वरित उपाय जरूरी है।उन्होंने बताया कि वे सकरा और गायघाट प्रखंड की विभिन्न गांव में पहुंचे. किसान उपेंद्र राय के खेत में आलू पर झुलसा रोग का प्रकोप दिखा। किसान को इससे बचाव की जानकारी दी गयी। किसानों के लिए एडवाइजरी जारी की गई है।
इन दवाओं के प्रयोग से फसलों के बचाव सम्भव:
उन्होंने बताया कि झुलसा रोग फाइटोथोड़ा इंफेस्टेस नामक फंगस के कारण होता है. तापमान के 10 से 15 डिग्री सेल्सियस रहने पर आलू में पिछात झुलसा रोग होता है. रोग का संक्रमण रहने पर व बारिश होते ही कम समय में फसल को नष्ट कर देता है. रोग से आलू की पत्तियां किनारे से सूखती हैं.
जब तक आलू के खेत में इस रोग के लक्षण नहीं दिखाई देता है, तब तक मैंकोजेब युक्त फफूंदनाशक 0.2 प्रतिशत की दर से यानि जब तक आलू के खेत में इस रोग के लक्षण नहीं दिखाई देता है, तब तक मैंकोजेब युक्त फफूंदनाशक 0.2 प्रतिशत की दर से यानि दो ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर सकते है. लेकिन एक बार रोग के लक्षण दिखाई देने के बाद मैंकोजेब नामक देने का कोई असर नहीं होगा. इसलिए जिन खेतों में बीमारी के लक्षण दिखने लगे हों उनमें साइमोइक्सेनील मैनकोजेब दवा की 3 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें.

उन्होंने बताया कि प्रबंधन फसल की सुरक्षा के लिए किसान दो सप्ताह के अंतराल पर मैकोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण दो किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें. संक्रमित फसल में मैकोजेब 63 प्रतिशत व मेटालैक्सल 8 प्रतिशत या कार्बेन्डाजिम व मैकोनेच संयुक्त उत्पाद का 2ग्राम प्रति लीटर पानी या 2 कीलोग्राम प्रति हेक्टेयर
200 से 250 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें. तापमान के 10 डिग्री से नीचे होन पर किसान रिडोमिल 4 प्रतिशत एम. आई का प्रयोग करे
अगात झुलसा रोग जो अल्टरनेरिया सोलेनाई नामक फफूंद के कारण होता है. इसमें निचली पत्तियों पर रिंग जैसे गोलाकार धब्बे बनते हैं. इसके कारण अंदर में सेन्ट्रिक रिंग बना होता है. पत्ती पीली पड़ कर सूख जाती है. यह रोग देर से लगता है, रोग का लक्षण दिखाई देने पर जिनेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण दो किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या मैकोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील पूर्ण दो किलोग्राम प्रति हेक्टेयर अथवा कॉपर ऑक्सीक्लोराईड 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।















