-बागमती की मृत धारा पर 8 महीने से सुनवाई, समाधान अब भी अधूरा; जल संसाधन विभाग की कार्यशैली पर उठे सवाल
मुजफ्फरपुर/मीनापुर। उत्तर बिहार की जीवनदायिनी मानी जाने वाली बागमती नदी की पुरानी (मृत) धारा को पुनर्जीवित करने की मांग को लेकर पिछले आठ महीनों से चल रही शिकायत प्रक्रिया के बावजूद कोई ठोस समाधान सामने नहीं आने से जल संसाधन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ता एवं छात्र राजद के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष अमरेन्द्र कुमार द्वारा दायर शिकायत पर लगातार सुनवाई हो रही है, लेकिन विभाग अब तक यह स्पष्ट नहीं कर पाया है कि बेलवा घाट से मकसूदपुर होते हुए नरकटिया तक फैली पुरानी धारा का वास्तविक स्वरूप क्या है और उसके पुनर्जीवन की क्या संभावना है।
अमरेन्द्र कुमार ने 10 अक्टूबर 2025 को मुख्यमंत्री के समक्ष आवेदन देकर मांग की थी कि मीनापुर प्रखंड के बेलवा घाट से मकसूदपुर और नरकटिया तक बागमती की पुरानी धारा की गाद सफाई (डी-सिल्टिंग) कर उसे पुनर्जीवित किया जाए। आवेदन में कहा गया था कि वर्षों की उपेक्षा के कारण धारा गाद, सिल्ट और जलकुंभी से भरकर मृतप्राय हो चुकी है, जिससे बाढ़, सिंचाई, भू-जल स्तर और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
जनहित से जुड़े अहम मुद्दे उठाए गए
शिकायत में कहा गया था कि मृत धारा के कारण बाढ़ के समय मुख्य धारा पर अतिरिक्त दबाव बढ़ता है, हजारों एकड़ कृषि भूमि प्राकृतिक सिंचाई स्रोत से वंचित हो रही है, भू-जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है तथा जलीय जैव विविधता और पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। कई गांवों में पेयजल संकट भी गहराने लगा है।
सुनवाई का क्रम:
20 नवंबर 2025 को हुई पहली महत्वपूर्ण सुनवाई में जल संसाधन विभाग ने बागमती-बूढ़ी गंडक लिंक चैनल परियोजना का हवाला देते हुए कहा कि बेलवा घाट से मकसूदपुर तक कार्य कराना उचित नहीं है। हालांकि विभाग यह स्पष्ट नहीं कर सका कि ऐसा क्यों है। इस पर लोक शिकायत प्राधिकार ने विस्तृत प्रतिवेदन मांगा।
17 दिसंबर 2025 की सुनवाई में भी विभाग कोई नया तथ्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिसके बाद मामला अगली तिथि के लिए स्थगित कर दिया गया।
09 जनवरी 2026 को विभाग ने बताया कि लिंक चैनल परियोजना का 79 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है तथा शेष 12 किलोमीटर में उड़ाही का कार्य बाकी है। विभाग ने यह भी कहा कि पुरानी धारा के कई हिस्सों पर लोगों ने मिट्टी भरकर खेती शुरू कर दी है और कई स्थान रैयती भूमि में आते हैं। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यदि वह वास्तव में नदी की धारा थी तो उस पर अतिक्रमण कैसे हुआ और उसे रोकने के लिए क्या कार्रवाई की गई।

06 फरवरी 2026 को विभाग ने पुनः यही तर्क दिया कि स्थानीय लोग खेती कर रहे हैं और खुदाई से विवाद उत्पन्न हो सकता है। इसके आधार पर मामले को समाप्त कर दिया गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने विभागीय लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी के समक्ष अपील दायर की।
अपील के बाद फिर खुला मामला:
27 मई 2026 को प्रथम अपीलीय प्राधिकार ने विभाग के प्रतिवेदन की समीक्षा करते हुए पाया कि विभाग ने केवल खेती और रैयती भूमि का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का प्रयास किया है। प्राधिकार ने विभाग को निर्देश दिया कि वह स्पष्ट करे कि संबंधित क्षेत्र मूल स्वीकृत प्राक्कलन में शामिल है या नहीं तथा विस्तृत अद्यतन प्रतिवेदन के साथ अगली सुनवाई में उपस्थित हो। मामले की अगली सुनवाई 17 जून 2026 को निर्धारित की गई है।
विभाग की भूमिका पर उठ रहे प्रश्न:
इस पूरे मामले में कई अहम सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि विभाग ने पुरानी धारा का निरीक्षण किया है तो यह स्पष्ट क्यों नहीं किया गया कि सरकारी अभिलेखों में उसकी स्थिति क्या है। यदि नदी की धारा पर अतिक्रमण हुआ है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है। वहीं यदि लिंक चैनल परियोजना का उद्देश्य बागमती की पुरानी धारा को पुनर्जीवित करना है, तो बेलवा घाट, मकसूदपुर और नरकटिया क्षेत्र को योजना से बाहर क्यों रखा गया।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभाग ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण, जल प्रवाह अध्ययन, बाढ़ प्रबंधन विश्लेषण अथवा पर्यावरणीय मूल्यांकन जैसी आवश्यक प्रक्रियाओं को सार्वजनिक नहीं किया और केवल संभावित विवाद का हवाला देकर मामले को समाप्त करने का प्रयास किया।
जनता की उम्मीदें 17 जून की सुनवाई पर टिकीं:
अपीलीय प्राधिकार द्वारा दोबारा सुनवाई शुरू किए जाने से क्षेत्र के लोगों में उम्मीद जगी है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि बागमती की मृत धारा का पुनर्जीवन केवल नदी संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, पर्यावरण संतुलन और लाखों लोगों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा है। अब सबकी निगाहें 17 जून 2026 की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां विभाग को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी और यह बताना होगा कि धारा के संरक्षण एवं पुनर्जीवन के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।












