-ईरान युद्ध का वैश्विक असर: भारत में तेल और घरेलू गैस आपूर्ति पर क्या पड़ेगा प्रभाव?
आलेख : दीपक कुमार तिवारी।
मध्य-पूर्व क्षेत्र लंबे समय से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र रहा है। यदि Iran से जुड़ा युद्ध या बड़ा सैन्य तनाव उत्पन्न होता है, तो इसका सीधा प्रभाव दुनिया के तेल बाजार पर पड़ता है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह स्थिति बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयातित कच्चे तेल और गैस पर निर्भर है।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 80-85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में मध्य-पूर्व में किसी भी युद्ध या तनाव की स्थिति अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को तेजी से बढ़ा सकती है। यदि ईरान के आसपास के समुद्री मार्ग, विशेषकर Strait of Hormuz प्रभावित होते हैं, तो वैश्विक तेल आपूर्ति में बाधा आ सकती है। यह मार्ग दुनिया के लगभग एक-तिहाई तेल परिवहन का प्रमुख रास्ता माना जाता है।
भारत के लिए इसका सबसे बड़ा असर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर देखने को मिल सकता है। देश में घरेलू रसोई गैस की आपूर्ति मुख्य रूप से Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी कंपनियों के माध्यम से होती है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और एलपीजी की कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार को या तो सब्सिडी का बोझ बढ़ाना पड़ता है या उपभोक्ताओं को महंगी गैस का सामना करना पड़ सकता है।

घरेलू गैस आपूर्ति पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है। भारत में Ministry of Petroleum and Natural Gas के अनुसार देश एलपीजी का भी एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। युद्ध की स्थिति में शिपिंग लागत, बीमा और परिवहन जोखिम बढ़ जाते हैं, जिससे गैस सिलेंडर की कीमतों पर दबाव बन सकता है।
हालांकि भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति पर काम कर रही है। रूस, अमेरिका और अफ्रीकी देशों से तेल आयात बढ़ाकर आपूर्ति को संतुलित करने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही घरेलू उत्पादन बढ़ाने और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा चलता है तो इसका असर केवल ईंधन कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन लागत बढ़ने से महंगाई, खाद्य पदार्थों की कीमतें और औद्योगिक उत्पादन भी प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति और मजबूत करनी होगी।
निष्कर्षतः ईरान से जुड़े किसी भी युद्ध का प्रभाव केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह स्थिति तेल और घरेलू गैस की कीमतों, आपूर्ति और महंगाई के रूप में महसूस की जा सकती है। इसलिए ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और वैकल्पिक ऊर्जा पर निवेश भविष्य की बड़ी जरूरत बन गया है।











