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राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र की बड़ी उपलब्धि: बढ़ी लीची की शेल्फ लाइफ

-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र की बड़ी उपलब्धि: बढ़ी लीची की शेल्फ लाइफ

-नई किस्मों और उत्पादों से किसानों को मिलेगा लाभ

मुजफ्फरपुर।दीपक कुमार तिवारी। लीची उत्पादन के क्षेत्र में देश के प्रमुख संस्थान राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र (NRCL), मुजफ्फरपुर ने बीते 26 वर्षों में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। केंद्र ने जहां लीची की शेल्फ लाइफ बढ़ाने में सफलता प्राप्त की है, वहीं किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से नई लेट वैरायटी और लीची आधारित कई मूल्यवर्धित उत्पाद भी विकसित किए हैं। हालांकि, दूसरी ओर लीची स्टिंक बग नामक कीट अब नई चुनौती बनकर सामने आया है, जिससे मीनापुर क्षेत्र के करीब 700 एकड़ लीची बाग प्रभावित हुए हैं।

वर्ष 2001 में स्थापित राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र लगातार लीची उत्पादन, संरक्षण और प्रसंस्करण के क्षेत्र में शोध कर रहा है। संस्थान के वैज्ञानिकों ने लीची का स्वाद पूरे वर्ष उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कई अभिनव उत्पाद विकसित किए हैं। इनमें लीची शहद, लीची रसगुल्ला (लीचीगुल्ला) और हाल ही में विकसित ‘लीचीमिश’ प्रमुख हैं।

संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. अंकित कुमार और उनकी टीम द्वारा विकसित लीचीमिश में लीची की प्राकृतिक मिठास और पौष्टिकता को संरक्षित रखा गया है। इसे लीची के पल्प, चीनी और साइट्रिक एसिड के मिश्रण से तैयार किया जाता है। पल्प को बीज से अलग कर विशेष प्रक्रिया के तहत चीनी के घोल में सुखाया जाता है और बाद में ओवन में ड्राई कर किशमिश जैसे रूप में तैयार किया जाता है। इसकी शेल्फ लाइफ लगभग एक वर्ष तक बताई गई है।

शेल्फ लाइफ बढ़ाने में मिली बड़ी सफलता:

राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र ने मॉडिफाइड एटमॉस्फियर पैकेजिंग (MAP) तकनीक का सफल परीक्षण किया है। इस तकनीक के माध्यम से बिना कोल्ड चेन या रेफ्रिजरेटेड वाहन के सामान्य तापमान पर लीची को सड़क मार्ग से दिल्ली तक सुरक्षित पहुंचाया गया।

केंद्र के निदेशक डॉ. बिकास दास ने बताया कि पिछले दो वर्षों से इस तकनीक पर लगातार परीक्षण चल रहा था और इस बार इसे पूर्ण सफलता मिली है। अब इस तकनीक का प्रचार-प्रसार किसानों और व्यापारियों के बीच किया जा रहा है ताकि वे इसका व्यावसायिक लाभ उठा सकें।

उन्होंने बताया कि इस तकनीक से लीची की शेल्फ लाइफ दो दिन से बढ़कर पांच दिन तक हो गई है। भारत में 95 प्रतिशत से अधिक लीची का परिवहन सामान्य वाहनों और सामान्य तापमान पर होता है, ऐसे में यह तकनीक किसानों और व्यापारियों के लिए काफी लाभकारी साबित होगी।

किसानों को मिलेंगी तीन नई लेट वैरायटी:

डॉ. दास ने बताया कि वर्तमान में शाही लीची का सीजन लगभग 15 दिनों और चाइना लीची का सीजन करीब 10 दिनों तक सीमित रहता है। इससे किसानों को सीमित समय में ही अपनी उपज बेचनी पड़ती है।

इस समस्या के समाधान के लिए संस्थान ने तीन नई लेट वैरायटी विकसित की हैं— गंडकी संपदा, गंडकी योगिता और गंडकी लालिमा। ये किस्में जुलाई के मध्य तक बाजार में उपलब्ध रहेंगी, जिससे किसानों को लंबे समय तक उत्पादन और बिक्री का अवसर मिलेगा तथा उनकी आय में बढ़ोतरी होगी।

लीची खेती का बढ़ा दायरा:

राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के अनुसार देश में लीची की खेती का क्षेत्रफल पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ा है। जहां पहले लगभग 55 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में लीची की खेती होती थी, वहीं अब यह बढ़कर करीब 99 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गई है। इसी अवधि में उत्पादन भी 2.5 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर लगभग 7 लाख मीट्रिक टन हो गया है।

संस्थान ने अब तक 52 लीची जर्मप्लाज्म और आठ अंतरराष्ट्रीय किस्मों का संरक्षण किया है, जो भविष्य के अनुसंधान और नई किस्मों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

स्टिंक बग बनी नई चुनौती:

उपलब्धियों के बीच लीची उत्पादकों के सामने लीची स्टिंक बग की समस्या भी उभरकर सामने आई है। मीनापुर क्षेत्र में लगभग 700 एकड़ लीची बाग इस कीट से प्रभावित हुए हैं। इसके नियंत्रण के लिए वैज्ञानिकों और किसानों की सहभागिता से सामूहिक रोकथाम अभियान चलाया जा रहा है। साथ ही संस्थान किसानों को जागरूक करने और वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध कराने का कार्य भी कर रहा है।

राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र की ये उपलब्धियां न केवल लीची किसानों की आय बढ़ाने में सहायक साबित होंगी, बल्कि मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध लीची को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।