-ऐसे में हम कैसे कर पाएंगे ग़ैरप्रदेशों की उम्दा खेती की बराबरी?
-यूरिया के लिए त्राहिमाम के हैं कई जिम्मेवार पहलू
मुजफ्फरपुर।दीपक कुमार तिवारी।
क्षेत्र में यूरिया खाद को लेकर भारी किल्लत है। किसानों में त्राहिमाम मची हुई है।विभाग के अधिकारी सभी जगहों पर रेगुलर आवंटन के दावे कर रहे हैं,वहीं दुकानदारों के दावे हैं कि उन्हें डिमांड के अनुसार से यूरिया खाद का आवंटन नहीं हो पा रहे रहा है, जबकि किसानों का सीधा आरोप है कि उन्हें जरूरत के हिसाब से यूरिया नहीं मिल पा रही है। लिहाजा खेती अभी चौपट हो रहा है। इस बीच हत्था में किसान एवं पूर्व प्रखंड उपप्रमुख दिनेश राय ने बताया कि यूरिया खाद की किल्लत जरूर है,लेकिन जो संपन्न किसान हैं। इलाके के ऐसे किसानों के बीच किल्लत नहीं है,क्योंकि ऐसे किसानों के द्वारा पूर्व से ही संभावित किल्लत को देखते हुए अपनी जरूरत के अनुसार पर्याप्त मात्रा में खाद खरीद कर स्टॉक कर लिया गया था। उन्होंने बताया कि उन्हें भी यूरिया खाद की किल्लत नहीं है, क्योंकि उन्हें पता था उन्हें 20-25 बोरी यूरिया खाद की जरूरत थी और उन्होंने खेत की जरूरत के हिसाब से पहले ही खरीदारी कर ली थी। उनके तरीके का दर्जनों ऐसे किसान हैं । जिन्होंने पहले से खाद की खरीदारी कर ली थी।वही बन्दरा में किसान सतीश कुमार मिश्र ने बताया कि निम्न एवं मध्यमवर्गीय किसानों के लिए भले ही किल्लत है, लेकिन लाइसेंसी दुकानदारों के जो नाते रिश्तेदार या नजदीकी लोग हैं। उनके लिए खादों की किल्लत नहीं है और ना ही क्षेत्र के किसी भी जनप्रतिनिधि को खाद्य की किल्लत है। खाद की किल्लत आम एवं सामान्य किसान को है। जिनकी आवाज ना कोई उठाने वाला है,न ही वह किसी दुकानदार के खिलाफ लिखित रूप से शिकायत करने को आगे आने की उनमें क्षमता और समय है, क्योंकि जिसके खिलाफ लिखित शिकायत करेगा सीधा उससे उसकी दुश्मनी हो जाती है और अधिकारी कार्यवाई के बदले मामले को रफा-दफा कर देते हैं। कई बार मामले को दबा देते हैं।

ऐसे में कोई भी किसान लिख कर देने को तैयार नहीं है।लोहरखा के मनोज यादव ने बताया कि किसान समझता है कि ऐसे में जो भी 1-2 बोरा खाद उसे मिल रहा है।वह भी नहीं मिलेगा। बंदरा प्रखंड के उपप्रमुख उमेश राय का बताना है कि कोई किसान लिखित रूप से शिकायत देने को तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में किस पर और कैसे कार्रवाई की जाएगी।वहीं बन्दरा के प्रखंड कृषि अधिकारी अर्जुन पासवान ने बताया कि जांच करने के लिए उनके पास उचित डिग्री नहीं है।वे दूसरे विभाग से प्रोन्नत कर उन्हें बीएओ बनाया गया है। लिहाजा जांच की जिम्मेवारी सभी कृषि समन्वयकों को दी गई है तथा जांच रिपोर्ट जिला स्तरीय मॉनिटरिंग कमिटी को दी जा रही है। लिहाजा प्रखंड क्षेत्र में यूरिया खाद की किल्लत, कालाबाजारी, उपलब्धता और डिमांड आदि की क्या स्थिति है। उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।

ग़ैरलाइसेंसी दुकानदारों से भी हो रही बदनामी:
बन्दरा में जयप्रकाश यादव ने बताया कि इलाके में ग़ैरलाइसेंसी दुकानदार खुलेआम 5-600 रुपया में खाद बेच रहा है।उसपर कार्यवाई होती नहीं है और बदनामी लाइसेंसी दुकानदारों की होती है। पड़ोसी जिला क्षेत्र सैदपुर-पूसा के दुकानों से भी किसान 600 का बोरा यूरिया ला रहा है। दिन में फोन पर बात होती है। शाम ढलने के बाद या रात में खाद मिल जाता है,लेकिन तेज तर्रार लोगों को नहीं मिलता है।
डिमांड 1000 बोरे का मिल रहा 100 बोरा:
वही क्षेत्र के खाद दुकानदारों का बताना है कि जिस हिसाब से क्षेत्र में यूरिया खाद का डिमांड है। उसके अनुपात में उन्हें यूरिया का आवंटन नहीं दिया जा रहा है। बन्दरा में कई दुकानदारों ने बताया कि जिस दुकानदार को 100 बोरी यूरिया का आवंटन दिया जा रहा है। वहां यदि हजार बोरा भी उपलब्ध करा दी जाए तो अभी सहज रूप से और देखते ही देखते खाद बिक जाएंगे। कोई भी किसान 10 बोरा से कम यूरिया तो मांगता ही नहीं है। जिन्हें एक से 2 बोरा यूरिया खाद देकर लौटाने की मजबूरी है। वही यूरिया के आवंटन के साथ हीं एक से डेढ़ गुना सल्फर, नैनो यूरिया आदि का आवंटन दे दिया जा रहा है। जिसे किसान लेने को तैयार नहीं है।उसकी जरूरत भी किसानों को नहीं है,लिहाजा इसे बेचना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में उन लोगों का पूंजी भी फंस रहा है।
किसानों में नैनो यूरिया के प्रति है अविश्वास:
बन्दरा में जयप्रकाश यादव ने बताया कि ऐसे हालात में किसानों को नैनो यूरिया के प्रयोग के लिए जागरूक करने की भी जरूरत है,क्योंकि जानकारी एवं जागरूकता और विश्वास के अभाव में लोग नैनो यूरिया का प्रयोग करने से कतरा रहे हैं। लोगों में इसको लेकर भ्रांति है। किसानों का यह कहना है कि नैनो यूरिया फायदा नहीं करता है। यूरिया के मुकाबले इसकी गुणवत्ता अच्छी नहीं होती है, लिहाजा लोग नैनो यूरिया का प्रयोग करना नहीं चाहते हैं।
पूर्व कुलपति बोले,ऐसे हो सकता है नियंत्रण:
इस संबंध में पूसा राजेन्द्र कृषि विवि के पूर्व कुलपति डॉ गोपाल जी त्रिवेदी ने बताया कि यूरिया के लिए इलाके में त्राहिमाम की स्थिति है। यूरिया की किल्लत के लिए खाद के बड़े कारोबारी और बड़े अधिकारी भी जिम्मेवार हैं। उन्होंने बताया कि जो-जो स्टॉकिस्ट है। उस पर बड़े स्तर के अधिकारियों को पहले से चिन्हित कर कार्रवाई करनी चाहिए थी। खादों का जो आवंटन किया जा रहा है। वह उचित किसानों तक पहुंच रहा है या नहीं,इसका मॉनिटरिंग वरीय अधिकारियों को खुद ईमानदारी से करनी चाहिए थी। जो स्टॉकिस्ट हैं और बड़े लेवल पर खादों को होल्ड कर ब्लैक मार्केटिंग में लगे हुए हैं। उस पर सीधा कार्रवाई होनी और दिखनी चाहिए,ताकि छोटे स्तर के कारोबारी खुद तत्परता से काम करना शुरू कर दें।

वही किसानों में नैनो यूरिया प्रयोग को लेकर व्यापक स्तर पर जगह-जगह जन जागरूकता अभियान चलानी चाहिए।उन्होंने कहा कि ज्यादातर किसानों में यह भ्रांतियां हैं कि नैनो यूरिया खेतों में फायदा नहीं करता है। कुछ लोग ज्यादा यूरिया के प्रयोग को ही फायदेमंद मानते हैं, जबकि यह दोनों ही स्थिति खतरनाक है। उन्होंने बताया कि हमें यूरिया पर निर्भरता को रोकनी होगी तथा नैनो यूरिया का प्रयोग भी बढ़ाना पड़ेगा।यह बात किसानों को समझना और समझाना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि यूरिया के प्रयोग के बदले जैविक खेती पर जोर देने से भी इसकी पूर्ति की जा सकती है। खेतों में गोबर-गोवा का प्रयोग, केंचुआ-खाद(वर्मी कम्पोस्ट) का प्रयोग, नैनो यूरिया का प्रयोग तथा फसलों का परिवर्तित रूप से प्रयोग,मिश्रित खेती करके यूरिया की जरूरत को कम किया जा सकता है। वही धान, गेहूं,मक्का आदि के डंठलों को खेतों में जोतकर मिट्टी में दबा देने(सराने)से भी यूरिया की जरूरत कम पड़ती है। इन तमाम बातों के प्रति कृषि वैज्ञानिकों को गांव-गांव जाकर छोटे-छोटे स्तरों पर जन जागरूकता का कार्यक्रम चलाकर लोगों को जागरूक करने की जरूरत है।सीनियर-जूनियर कृषि अफसरों एवं वैज्ञानिकों को ऑफिस में बैठकर मीटिंग करने से ज्यादा सीधा किसानों के घरों एवं खेतों में जाना होगा।तब जब खादों की जरूरत और उपयोगिता समझाई जाएगी। तभी हम यूरिया एवं डीएपी जैसे खादों पर निर्भरता को रोक पाएंगे,अन्यथा ऐसे ही प्रत्येक साल समसामयिक फसलों के जुताई-बुवाई के समय हाहाकार की स्थिति बनती रहेगी और लोग परेशान होते रहेंगे। उन्होंने बताया कि ऐसी स्थिति में खाद को होल्ड करने वाले बड़े कारोबारी और माफिया धनकुबेर बनते हैं और गरीब किसान कंगाल एवं तंगहाल हो रहे हैं।
















