-धर्मनगरी में जहर का धुआं: अवैध भट्ठों से मथुरा की हवा जहरीली, प्रशासन पर उठे गंभीर सवाल
मथुरा | विवेक अरोड़ा।
धार्मिक आस्था के केंद्र मथुरा की पहचान आज एक खतरनाक पर्यावरणीय संकट से घिरती नजर आ रही है। शहर और उससे सटे ग्रामीण इलाकों में अवैध रूप से संचालित ईंट भट्ठों से निकलता काला धुआं अब ‘साइलेंट किलर’ बन चुका है। हालात ऐसे हैं कि आबादी वाले क्षेत्रों के पास ही दिन-रात जहरीला धुआं उगलती चिमनियां लोगों की सांसों में जहर घोल रही हैं।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, नियमों को ताक पर रखकर ये भट्ठे घनी आबादी के बिल्कुल नजदीक चलाए जा रहे हैं, जबकि पर्यावरणीय मानकों के अनुसार इन्हें सुरक्षित दूरी पर होना चाहिए। आसमान में धुएं की मोटी परत छाई रहती है, जिससे न सिर्फ वायु गुणवत्ता खराब हो रही है बल्कि दृश्यता भी प्रभावित हो रही है।
स्वास्थ्य और खेती पर दोहरा असर:
इस प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ रहा है। दमा और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। वहीं, भट्ठों से निकलने वाली राख और अत्यधिक गर्मी ने आसपास की उपजाऊ जमीन को बंजर बनाना शुरू कर दिया है। किसानों का कहना है कि फसलें बर्बाद हो रही हैं, लेकिन शिकायत करने पर उन्हें दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ता है।
प्रशासन और प्रदूषण बोर्ड पर सवाल:
सबसे हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ प्रशासन और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) की नजरों के सामने हो रहा है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की गाइडलाइंस के बावजूद न तो भट्ठों पर सख्त कार्रवाई हो रही है और न ही प्रदूषण नियंत्रण के उपाय लागू किए जा रहे हैं। इससे प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

यमुना एक्सप्रेसवे और जेवर एयरपोर्ट पर खतरा:
यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे स्थित ये भट्ठे देश के सबसे प्रदूषित मार्गों में इसे शामिल करने की ओर बढ़ रहे हैं। सर्दियों के दौरान स्मॉग की स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि दृश्यता 500 मीटर से भी कम रह जाती है। ऐसे में निकट भविष्य में शुरू होने वाले जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के हवाई संचालन पर भी इसका असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
ज्वलंत सवाल जो जवाब मांगते हैं:
बढ़ती सांस और फेफड़ों की बीमारियों की जिम्मेदारी किसकी?
क्या भट्ठों का धुआं भविष्य में हवाई उड़ानों के लिए खतरा बनेगा?
किसानों की बर्बाद होती जमीन और फसलों की भरपाई कौन करेगा?
NGT के नियमों का पालन क्यों नहीं हो रहा?
क्या भट्ठों में प्रदूषण नियंत्रक फिल्टर लगे हैं या सस्ते ईंधन के रूप में टायर जलाए जा रहे हैं?
भट्ठों से निकलने वाली राख का निस्तारण कैसे हो रहा है? क्या इससे भूजल और यमुना नदी प्रदूषित हो रही है?
दरअसल इस रिपोर्ट का उद्देश्य प्रशासन को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि उसे उसकी जिम्मेदारियों का एहसास कराना है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन कब तक इस ‘जहरीले धुएं’ पर लगाम लगाता है, या फिर मथुरा की हवा यूं ही लोगों के लिए धीमा जहर बनी रहेगी।
















