-स्कूली शिक्षा प्रणाली को वैश्विक मानकों के अनुरूप विकसित करना होगा : प्रसून दत्त सिंह
– ‘स्कूली शिक्षा में भारतीय ज्ञान परम्परा का समावेशन’ विषय पर व्याख्यान आयोजित
मोतिहारी, राजन द्विवेदी।
महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के संस्कृत विभाग द्वारा ‘स्कूली शिक्षा में भारतीय ज्ञान परम्परा का समावेशन’ विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन आचार्य बृहस्पति सभागार में गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप-प्रज्वलन एवं माँ सरस्वती तथा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमाओं पर पुष्पार्पण के साथ हुआ।
विषय प्रवर्तन करते हुए संस्कृत विभाग के अध्यक्ष एवं विश्वविद्यालय के कुलानुशासक आचार्य प्रसून दत्त सिंह ने भारतीय ज्ञान परम्परा की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से ही छात्रों में भारतीय ज्ञान परम्परा के बीज बोए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने परिवार को प्राथमिक शिक्षा की पहली इकाई बताते हुए कहा कि यदि माता-पिता भारतीय ज्ञान आधारित जीवन-शैली अपनाते हैं, तो वह स्वाभाविक रूप से बच्चों के व्यक्तित्व में परिलक्षित होगी। गुरु उस ज्ञान का परिष्कार कर छात्रों में वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित चिंतन विकसित करने में सक्षम होते हैं।
विशिष्ट अतिथि के रूप में वाराणसी से पधारे प्रख्यात स्कूली शिक्षाविद सुदीप बनर्जी ने अपने उद्बोधन में पश्चिमी ज्ञान के अंधानुकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय प्राचीन ज्ञान प्रणाली अत्यंत उन्नत, वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित रही है।

उन्होंने वर्तमान स्कूली शिक्षा प्रणाली को रटने-आधारित एवं क्लर्कीय मानसिकता विकसित करने वाली बताते हुए कहा कि यह प्रणाली विद्यार्थियों को स्वतंत्र चिंतन के बजाय परतंत्रता की ओर ले जाती है। उन्होंने बल दिया कि आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय ज्ञान परम्परा के सार-तत्वों को आधुनिक आवश्यकताओं के साथ समन्वित कर शिक्षा में समाविष्ट किया जाए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य संजय श्रीवास्तव ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि प्राथमिक शिक्षा में राज्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैश्वीकरण के इस युग में भारत को अपनी स्कूली शिक्षा प्रणाली को वैश्विक मानकों के अनुरूप विकसित करना होगा, जिसमें भारतीय ज्ञान और आध्यात्म का अद्वितीय समन्वय हो। उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों से अधिक परिश्रम तो कराती है, किन्तु उनके भीतर नवाचार की संभावनाओं को सीमित कर देती है। अतः समय की आवश्यकता है कि तकनीकी ज्ञान एवं आध्यात्मिक मूल्यों का संतुलित समावेश किया जाए, जिससे भारत विश्व को शांति और मानवता का संदेश दे सके।
कार्यक्रम में संस्कृत विभाग के आचार्य डॉ. श्याम झा ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन वाणिज्य विभाग के अध्यक्ष आचार्य श्रीश मिश्रा ने किया। कार्यक्रम संचालन डॉ. अंबिकेश कुमार त्रिपाठी ने किया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के आचार्यगण, सह-आचार्य एवं सहायक-आचार्य उपस्थित रहे। बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने सहभागिता करते हुए भारतीय ज्ञान परम्परा के विविध आयामों पर अपना ज्ञानवर्धन किया। साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता रविशंकर वर्मा एवं नगर के अन्य गणमान्य व्यक्ति भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।












