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चंपारण की ऐतिहासिक धरोहरों को संजोने का किया प्रयास

-चंपारण की ऐतिहासिक धरोहरों को संजोने का किया प्रयास

-‘तलाश बापू की पदचिन्हों की’ पुस्तक पर शोध जारी

मोतिहारी, राजन द्विवेदी।

शुक्रवार को 71वीं वाहिनी सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी), मोतिहारी में कमांडेंट श्री प्रफुल्ल कुमार से आत्मीय भेंट के दौरान सेवानिवृत्त प्रबंधक, झारखंड राज्य ग्रामीण बैंक एवं जेवियर समाज सेवा संस्थान, रांची से जुड़े श्री पंकज कुमार श्रीवास्तव ने अपनी आगामी पुस्तक “तलाश बापू की पदचिन्हों की” के संदर्भ में विस्तृत चर्चा की। इस दौरान उन्होंने चंपारण के ऐतिहासिक स्थलों से जुड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाओं और स्मृतियों को संकलित करने के अपने प्रयासों को साझा किया।श्रीवास्तव ने 71वीं वाहिनी परिसर का भ्रमण करते हुए महात्मा गांधी से जुड़े विभिन्न तथ्यों को गहराई से समझा और उनकी अनुभूति की। उन्होंने बताया कि उनका उद्देश्य चंपारण की ऐतिहासिक विरासत को पुनः जीवंत करना है, ताकि नई पीढ़ी उस संघर्ष और इतिहास से परिचित हो सके जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा दी।पिपराकोठी (जिला पूर्वी चंपारण) का इतिहास ब्रिटिश औपनिवेशिक काल से गहराई से जुड़ा रहा है।

यह क्षेत्र नील की खेती और अंग्रेजी नीतियों के कारण विशेष महत्व रखता है। उस समय ‘मिस्टर रीड’ जैसे ब्रिटिश नील प्लांटरों का यहां प्रभाव था, जिनके अधीन किसानों को जबरन नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जाता था। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति पर गहरा असर पड़ा और सामाजिक शोषण बढ़ा।इन्हीं अत्याचारों के विरोध में वर्ष 1917 में चंपारण सत्याग्रह की शुरुआत हुई, जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया। यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय बना और किसानों को राहत दिलाने की दिशा में निर्णायक साबित हुआ।अपने भ्रमण के दौरान श्री श्रीवास्तव ने तुरकौलिया, बापूधाम रेलवे स्टेशन मोतिहारी, गांधी संग्रहालय, मधुबन कोठी और राजपुर कोठी जैसे ऐतिहासिक स्थलों का भी दौरा किया। उन्होंने कहा कि इन स्थानों की मिट्टी में आज भी गांधीजी के संघर्ष की गूंज महसूस होती है।कमांडेंट श्री प्रफुल्ल कुमार ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि वर्तमान समय में इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अपने अतीत से जोड़ना और उसे समझाना समाज को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।अंत में श्पंकज कुमार श्रीवास्तव को उनके शोध एवं लेखन कार्य के लिए स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।