Advertisement

मिट्टी के दीये से रोशन होती है कुम्हारों के घर की दिवाली

-मिट्टी के दीये से रोशन होती है कुम्हारों के घर की दिवाली

आलेख: दीपक कुमार तिवारी।

दीपावली का पर्व प्रकाश, आस्था, उल्लास और समृद्धि का प्रतीक है। इस दिन हर घर में दीप जलाकर अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश दिया जाता है। लेकिन इन दीपों के पीछे उन अनगिनत हाथों की मेहनत भी छिपी होती है, जो मिट्टी को आकार देकर दूसरों के घरों में उजाला पहुंचाते हैं। ये हाथ हैं कुम्हार-प्रजापति समाज के पारंपरिक शिल्पकारों के, जिनकी पीढ़ियां मिट्टी के साथ अपना जीवन, संस्कृति और आजीविका गढ़ती आई हैं। इनके लिए दीपावली केवल रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि साल भर की मेहनत को बाजार में पहचान दिलाने और परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की उम्मीद भी है।

मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा प्रखंड के महेशपुर गांव में आज भी कुम्हारी की यह पुश्तैनी कला पूरी जीवंतता के साथ दिखाई देती है। यहां रवि पंडित, राम शोभित पंडित और मक्खन पंडित जैसे कारीगर अपनी पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। इनके लिए मिट्टी केवल कच्चा माल नहीं, बल्कि जीवन का आधार, पारिवारिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान है। मिट्टी के साधारण पिंड को अपने हुनर और अनुभव से सुंदर दीये, हाथी, खिलौने और अन्य पारंपरिक आकृतियों में बदलना इनके लिए रोजमर्रा के काम से कहीं बढ़कर एक कला साधना है।

दुर्गापूजा के दौरान देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करने के बाद अब इन कारीगरों के हाथ दीपावली की तैयारियों में व्यस्त हैं। कहीं मिट्टी को गूंथकर दीये बनाने की तैयारी है तो कहीं चाक पर घूमती मिट्टी को आकार दिया जा रहा है। तैयार दीयों और पारंपरिक वस्तुओं को सुखाने, पकाने तथा बाजार के अनुरूप तैयार करने में परिवार के कई सदस्य सहयोग करते हैं। यह काम केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार की सामूहिक मेहनत से परंपरा आगे बढ़ती है।

मिट्टी के दीये में छिपी है लोकसंस्कृति की पहचान:

भारतीय समाज में मिट्टी के दीये का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति, परंपरा और मानवीय श्रम के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है। मिट्टी से जन्म लेने वाला दीया जब प्रकाश फैलाता है, तो वह हमें अपनी जड़ों और प्रकृति के प्रति जुड़ाव का एहसास कराता है। दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा सदियों से भारतीय जनजीवन का हिस्सा रही है। गांवों में आज भी आंगन, तुलसी चौरा, घर के दरवाजे और पूजा स्थलों पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा कायम है।

कुम्हार समाज इसी परंपरा को अपने हुनर के माध्यम से जीवित रखता है। दीपावली पर दीये और लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं, छठ पर्व पर पूजा के पारंपरिक पात्र तथा सामा-चकेवा पर्व के लिए विभिन्न आकृतियां तैयार करना इनके पारंपरिक व्यवसाय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस तरह इनका काम केवल एक त्योहार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि साल भर बिहार की लोकसंस्कृति और ग्रामीण जीवन की विभिन्न परंपराओं से जुड़ा रहता है।

आधुनिक बाजार की प्रतिस्पर्धा ने बढ़ाई मुश्किलें:

बदलते समय के साथ त्योहारों की सजावट और बाजार का स्वरूप भी तेजी से बदला है। बिजली से चलने वाली झालरों, रंग-बिरंगी एलईडी लाइटों, प्लास्टिक के सजावटी सामान और मशीनों से तैयार उत्पादों ने बाजार में अपनी जगह बना ली है। आकर्षक पैकेजिंग और आधुनिक डिजाइन के कारण इन वस्तुओं की ओर उपभोक्ताओं का रुझान बढ़ा है। इसका सीधा असर पारंपरिक मिट्टी के दीये और अन्य उत्पाद बनाने वाले कारीगरों के कारोबार पर पड़ा है।

कारीगरों की चुनौती केवल बाजार में प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं है। मिट्टी की उपलब्धता, परिवहन, ईंधन, रंग और अन्य कच्चे माल की बढ़ती लागत के साथ मेहनत भी लगातार बढ़ रही है। इसके बावजूद तैयार उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिल पाना उनकी आर्थिक परेशानी को और गहरा करता है। कई बार लागत और श्रम के अनुरूप बिक्री नहीं होने से परिवारों की आमदनी प्रभावित होती है।

पारंपरिक कुम्हारी में समय और श्रम दोनों की बड़ी भूमिका होती है। मिट्टी जुटाने से लेकर उसे तैयार करने, आकार देने, सुखाने और पकाने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। इसके बाद उत्पाद बाजार तक पहुंचता है। इसके विपरीत आधुनिक मशीनों से तैयार सजावटी सामान बड़े पैमाने पर बाजार में उपलब्ध हो जाता है। ऐसे में छोटे और पारंपरिक कारीगरों के लिए प्रतिस्पर्धा करना आसान नहीं रह गया है।

त्योहारों की बिक्री से जुड़ी होती है साल भर की उम्मीद:

महेशपुर के कुम्हार परिवारों के लिए दीपावली और छठ जैसे पर्व अतिरिक्त आमदनी के महत्वपूर्ण अवसर होते हैं। इन त्योहारों में मिट्टी के दीये, हाथी, लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं और पूजा में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक वस्तुओं की मांग बढ़ती है। यही वह समय होता है, जब कारीगर अपनी मेहनत के बेहतर परिणाम की उम्मीद करते हैं।

हालांकि, त्योहारों के दौरान बढ़ती मांग के बावजूद उन्हें हमेशा उचित बाजार मूल्य नहीं मिल पाता। बिचौलियों और बाजार की प्रतिस्पर्धा के बीच छोटे कारीगरों की मोलभाव करने की क्षमता भी सीमित रहती है। यदि इनके उत्पादों को स्थानीय बाजार, मेलों, दुकानों और सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की बेहतर व्यवस्था हो, तो इनकी आमदनी में सुधार हो सकता है।

नई पीढ़ी को जोड़ना भी बड़ी चुनौती:

किसी भी पारंपरिक कला का संरक्षण तभी संभव है, जब अगली पीढ़ी भी उससे जुड़ी रहे। बदलती जीवनशैली और रोजगार के नए अवसरों के बीच युवा पीढ़ी का पारंपरिक कुम्हारी की ओर आकर्षण कम होना इस कला के भविष्य के लिए चिंता का विषय है। मेहनत के अनुपात में कम आमदनी और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां युवाओं को दूसरे रोजगार की ओर जाने के लिए प्रेरित करती हैं।

ऐसे में जरूरत है कि पारंपरिक कुम्हारी को आधुनिक बाजार की जरूरतों से जोड़ा जाए। कारीगरों को बेहतर डिजाइन, आकर्षक रंग-सज्जा, उत्पादों की गुणवत्ता, पैकेजिंग और डिजिटल मार्केटिंग का प्रशिक्षण मिले। सरकारी योजनाओं के माध्यम से आर्थिक सहायता, आधुनिक उपकरण, कच्चे माल की उपलब्धता और बाजार तक सीधी पहुंच सुनिश्चित की जाए। स्वयं सहायता समूहों, सहकारी समितियों और स्थानीय हस्तशिल्प मेलों के माध्यम से भी इनके उत्पादों को व्यापक पहचान दिलाई जा सकती है।

स्थानीय कारीगरों का सम्मान ही लोककला के संरक्षण का रास्ता:

सामाजिक चिंतक डॉ. श्याम किशोर ने लोगों से अपील की है कि दीपावली पर मिट्टी के दीये और पारंपरिक उत्पाद खरीदकर स्थानीय कारीगरों का उत्साह बढ़ाएं। उनका कहना है कि त्योहारों की वास्तविक खुशियां तभी सार्थक होंगी, जब हमारी परंपराओं से जुड़े श्रमिकों और शिल्पकारों के जीवन में भी खुशहाली आएगी।

उन्होंने रवि पंडित, राम शोभित पंडित और मक्खन पंडित सहित महेशपुर के अन्य कारीगरों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ये लोग केवल मिट्टी के बर्तन या दीये नहीं बना रहे, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। मिट्टी के दीये खरीदना स्थानीय हुनर, स्वदेशी शिल्प और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने का एक सरल माध्यम है।

एक दीया, दो घरों में रोशनी:

दरअसल, दीपावली पर मिट्टी का एक दीया जलाना केवल धार्मिक परंपरा का निर्वाह नहीं, बल्कि किसी स्थानीय कारीगर की मेहनत को सम्मान देने का भी अवसर है। जब हम बाजार से मिट्टी के दीये खरीदते हैं, तो अपने घर को रोशन करने के साथ उस परिवार की आजीविका में भी योगदान करते हैं, जिसने अपनी मेहनत और हुनर से उस दीये को तैयार किया है।

महेशपुर के कुम्हार परिवारों की कहानी केवल एक गांव या एक समाज की कहानी नहीं है। यह उन तमाम पारंपरिक शिल्पकारों की कहानी है, जो बदलते दौर में अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि समाज, सरकार और बाजार तीनों मिलकर ऐसे कारीगरों को संरक्षण और सम्मान दें।

क्योंकि मिट्टी का दीया जब जलता है, तो उसकी लौ केवल अंधकार दूर नहीं करती, बल्कि उस कुम्हार के घर में भी उम्मीद जगाती है, जिसके हाथों ने उसे आकार दिया है। हमारी लोकसंस्कृति तभी जीवित रहेगी, जब उसे गढ़ने वाले हाथों को सम्मान, रोजगार और उचित मेहनताना मिलेगा। इस दीपावली संकल्प लें कि आधुनिक सजावट के साथ मिट्टी के दीयों को भी अपने घरों में स्थान देंगे, ताकि हमारे आंगन के साथ महेशपुर के कुम्हारों के घरों में भी खुशियों का उजाला कायम रहे।