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माता-पिता, गांव, आम का पेड़ और खेतों की पुकार…

-माता-पिता, गांव, आम का पेड़ और खेतों की पुकार…

शहर की ऊंची इमारतों और भागती हुई जिंदगी के बीच आज अचानक मन बहुत दूर चला गया… उस गांव में, जहां बचपन अब भी किसी कोने में मेरा इंतजार कर रहा है।

याद आया वो कच्चा आंगन… बारिश के बाद मिट्टी से उठती सोंधी खुशबू… खेतों के बीच से गुजरती पतली पगडंडी… और आम के उस बूढ़े पेड़ की छांव, जिसके नीचे बैठकर कभी पूरी दुनिया अपनी लगती थी।

याद है, दादा जी कंधे पर गमछा रखे बगीचे में ले जाते थे। पेड़ से टूटकर गिरा पका आम जब हाथ में आता था, तो लगता था जैसे जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत मिल गई हो। मां दूर से आवाज लगाती थी—“बहुत मत दौड़ो, गिर जाओगे…”

और पिता… वो चुपचाप खेतों में पसीना बहाते रहते थे, ताकि हमारे सपनों की फसल कभी सूखने न पाए।

सच कहूं, माता-पिता भी गांव के उस पुराने आम के पेड़ जैसे ही होते हैं…

जो खुद धूप में जलते हैं, लेकिन हमें हमेशा छांव देते हैं।

जो बूढ़े जरूर हो जाते हैं, मगर उनकी जड़ें कभी कमजोर नहीं पड़तीं।

हम चाहे कितनी भी दूर निकल जाएं, उनकी दुआएं हमेशा हमारे पीछे-पीछे चलती रहती हैं।

लेकिन जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि…

जब तक हम समझते हैं कि गांव, खेत, मां-बाप और उनका साथ कितना अनमोल था, तब तक हम उनसे बहुत दूर जा चुके होते हैं।

आज भी शायद गांव के उस दरवाजे पर मां की आंखें रास्ता देखती होंगी…

पिता हर गुजरती गाड़ी की आवाज़ पर एक बार बाहर जरूर झांकते होंगे…

आम का वो पेड़ अब भी हर मौसम में फल देता होगा, जैसे कह रहा हो—

“एक बार लौट आओ… तुम्हारा बचपन अब भी यहीं टंगा है मेरी शाखाओं पर…”

शहर हमें पैसा दे सकता है, पहचान दे सकता है, लेकिन सुकून…

सुकून सिर्फ गांव देता है।

मां के हाथ की रोटी देती है।

पिता के माथे का पसीना देता है।

और खेतों से आती वो हवा देती है, जिसमें अपनापन घुला होता है।

कभी वक्त निकालिए…

बिना किसी काम के गांव जाइए।

माता-पिता के पास बैठिए।

खेतों की मेड़ पर चुपचाप चलिए।

आम के पेड़ को छूकर देखिए…

आप महसूस करेंगे कि जिंदगी की असली जड़ें अब भी वहीं हैं।

क्योंकि दुनिया में चाहे कितनी भी दूर निकल जाइए,

एक गांव हमेशा आपके भीतर जिंदा रहता है…

जहां मां आज भी आपका इंतजार करती है,

पिता आज भी आपके लिए चिंतित रहते हैं,

और बचपन आज भी नंगे पांव गलियों में दौड़ रहा होता है…!

#अनूप