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गांव की पुकार और माता-पिता का मौन प्रेम

-गांव की पुकार और माता-पिता का मौन प्रेम

आलेख: दीपक कुमार तिवारी।

शहर की चमचमाती रोशनी, ऊंची इमारतें और भागती हुई जिंदगी इंसान को बहुत कुछ दे देती हैं—सुविधाएं, पहचान और सपनों को पूरा करने का मौका। लेकिन इन सबके बीच कहीं न कहीं मन का एक कोना हमेशा खाली रह जाता है। वह कोना बार-बार हमें उस गांव की याद दिलाता है, जहां से हमारी जिंदगी की असली शुरुआत हुई थी।

गांव… जहां सुबह सूरज की पहली किरण के साथ खुलती थी। जहां मिट्टी की सोंधी खुशबू किसी इत्र से कम नहीं लगती थी। जहां खेतों के बीच से गुजरती पगडंडी सिर्फ रास्ता नहीं, बल्कि बचपन की यादों का पुल होती थी। और गांव का वह बूढ़ा आम का पेड़… जिसकी छांव में बैठकर जिंदगी सबसे खूबसूरत लगती थी।

बचपन में जब दादा जी बगीचे में ले जाते थे और पेड़ से गिरा पका आम हाथ में आता था, तो लगता था मानो दुनिया की सबसे बड़ी खुशी मिल गई हो। मां की आवाज आज भी कानों में गूंजती है—“धीरे दौड़ो, गिर जाओगे…”। उस एक आवाज में जितनी चिंता और प्यार था, उतना शायद पूरी दुनिया की दौलत में भी नहीं मिल सकता।

पिता का चेहरा याद आता है, जो बिना कुछ कहे खेतों में पसीना बहाते रहते थे। उनकी मेहनत सिर्फ फसल उगाने के लिए नहीं थी, बल्कि हमारे सपनों को सींचने के लिए थी। उन्होंने खुद की इच्छाओं को मिट्टी में मिला दिया ताकि हमारे भविष्य की फसल हरी-भरी रह सके।

असल में माता-पिता गांव के उस पुराने आम के पेड़ जैसे ही होते हैं।

वे खुद धूप सहते हैं, लेकिन हमें हमेशा छांव देते हैं।

वे बूढ़े हो जाते हैं, मगर उनका प्यार कभी बूढ़ा नहीं होता।

उनकी जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि हमारी हर खुशी और हर दुख उनसे जुड़ा रहता है।

समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इंसान जब तक रिश्तों और गांव की अहमियत समझता है, तब तक वह उनसे बहुत दूर निकल चुका होता है। शहर की भागदौड़ में हम इतना उलझ जाते हैं कि मां की प्रतीक्षा भरी आंखें और पिता की खामोश चिंता धीरे-धीरे स्मृतियों में बदलने लगती है।

शायद आज भी गांव के उस पुराने दरवाजे पर मां किसी आहट पर चौंक जाती होगी। पिता हर गुजरती गाड़ी की आवाज सुनकर एक बार बाहर जरूर देखते होंगे। और आम का वह पेड़ हर मौसम में फल देकर जैसे पुकारता होगा—

“लौट आओ… तुम्हारा बचपन अब भी मेरी शाखाओं पर टंगा है।”

सच तो यह है कि शहर हमें साधन दे सकता है, लेकिन सुकून नहीं। सुकून गांव की हवा में होता है। मां के हाथ की रोटी में होता है। पिता के माथे के पसीने में होता है। खेतों की मेड़ों पर चलती उस ठंडी हवा में होता है, जिसमें अपनापन घुला रहता है।

इसलिए कभी समय निकालिए। बिना किसी स्वार्थ के गांव जाइए। माता-पिता के पास बैठिए। खेतों के बीच चुपचाप कुछ कदम चलिए। आम के पेड़ को छूकर देखिए। आप महसूस करेंगे कि जिंदगी की असली जड़ें अब भी वहीं हैं।

क्योंकि इंसान चाहे दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच जाए, उसके भीतर एक गांव हमेशा जिंदा रहता है—

जहां मां आज भी इंतजार करती है,

पिता आज भी चिंता करते हैं,

और बचपन आज भी नंगे पांव गलियों में दौड़ता रहता है।