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पत्रकारिता के बंजारे हैं हम

-पत्रकारिता के बंजारे हैं हम

पत्रकारिता के बंजारे हैं हम,
राहों से अपना नाता है,
सच की धूप में तपकर ही,
हर लफ्ज़ हमारा आता है।
कलम को कभी झुकाया नहीं,
ये हमारी पहचान रही,
रिश्तों की तिजारत क्या करें,
जब रग-रग में सच्चाई बसी।
जो दिखता है वही लिखते हैं,
हकीकत से समझौता नहीं,
झूठ की चमक भले चकाचौंध करे,
पर हमसे वो रिश्ता नहीं।
दिखावे की दुनिया दूर रहे,
जमीर की स्याही गाढ़ी है,
हर शब्द में सच की खुशबू,
हर पंक्ति हमारी पहरेदारी है।
मिलना है तो मैदान में आ,
हौसलों से टकराकर देख,
हम भीड़ में खोने वाले नहीं,
अकेले ही कारवां बना लें एक।
उसूलों से बगावत क्या करें,
ये तो हमारी नींव है,
पहचान को गिरवी रख दें हम,
इतनी भी नहीं ये सस्ती चीज़ है।


तूफानों से लड़ना आता है,
डरकर किनारों पर क्या बैठें,
लहरों से आँख मिलाते हैं,
हर मुश्किल से रिश्ता रखते।
कलम हमारी तलवार भी है,
और सच की मजबूत ढाल,
झूठ के दरबार में जाकर,
नहीं झुकता अपना माथा-भाल।
अंधेरों में भी दीप जलाएं,
रौशनी की ही बात करें,
सत्ता के ऊँचे दरवाज़ों से नहीं,
जनता की आवाज़ को साथ करें।
हम वही हैं, जो हर दौर में,
सच का अलख जगाते हैं,
कलम की कसम खाकर हम,
हर सच को जग तक पहुँचाते हैं।

प्रस्तुति:दीपक कुमार तिवारी।