-डॉ. संजय मयूख : सत्ता के शिखर पर भी आत्मीयता का उजास
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और बिहार से दूसरे टर्म के विधान परिषद सदस्य डॉ. संजय मयूख का नाम आज राजनीति में उस व्यक्तित्व के रूप में लिया जाता है, जहां पद और प्रतिष्ठा के साथ विनम्रता, आत्मीयता और संगठननिष्ठा का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। राजनीति में ऐसे चेहरे कम ही होते हैं, जो शीर्ष पर पहुंचने के बाद भी अपने लोगों से उतनी ही गर्मजोशी से जुड़े रहते हैं, जितने संघर्ष के दिनों में रहते थे—डॉ. मयूख उन्हीं में से एक हैं।एक प्रसंग आज भी स्मृतियों में ताजा है। जब अरुण कुमार सिन्हा का टिकट कुम्हरार से कटने की चर्चा थी, तब स्वाभाविक रूप से नए नामों पर मंथन शुरू हुआ। उसी दौर में मैंने डॉ. संजय मयूख को फोन किया और सीधे पूछा—“क्या आप चुनाव लड़ेंगे?” जवाब संक्षिप्त, स्पष्ट और निस्पृह था—“नहीं।”हालांकि उस समय मीडिया में उनके नाम की खूब चर्चा थी, लेकिन सत्ता की चाह से दूर रहकर संगठन को प्राथमिकता देना, उनके राजनीतिक चरित्र का स्थायी भाव रहा है।आज फिर राजनीति के गलियारों में हलचल है। नितिन नवीन का राज्यसभा जाना लगभग फाइनल माना जा रहा है और ऐसे में बांकीपुर विधानसभा सीट खाली हो रही है। चर्चाओं में कई नाम हैं, लेकिन सबसे प्रमुखता से जो नाम उभरकर सामने आ रहा है, वह एक बार फिर डॉ. संजय मयूख का है। दिलचस्प बात यह है कि वे फिलहाल बिहार विधान परिषद के सदस्य हैं, इसके बावजूद कयास लगाए जा रहे हैं। मगर खबर यही है कि इस बार भी विधानसभा चुनाव लड़ने को लेकर वे खास उत्साहित नहीं हैं। उनका झुकाव आज भी संगठन के काम में रहकर पार्टी को मजबूत करने की दिशा में ही है।

डॉ. संजय मयूख की सबसे बड़ी खासियत यही है कि राजनीति के शिखर पर पहुंचने के बाद भी उनके भीतर कोई अहंकार नहीं आया। अपने लोगों के प्रति आत्मीयता, कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह और संवाद में अपनापन—ये गुण उन्हें भीड़ से अलग पहचान देते हैं।किसी भी काम के लिए, किसी भी समय उन्हें फोन कीजिए। चाहे वे दिल्ली में हों या पटना में, व्यस्तता के बीच भी जैसे ही फुर्सत मिलेगी, उधर से कॉल बैक जरूर आएगा। और सिर्फ औपचारिक आश्वासन नहीं, समस्या का वास्तविक समाधान होगा—यही उनका स्वभाव है।उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट रहती है। किसी के लिए मन में कटुता नहीं, न ही किसी प्रकार की राजनीतिक द्वेष भावना। 24 घंटे पार्टी के लिए समर्पित रहना उनके जीवन का अनुशासन है। शायद यही कारण है कि संगठन में उन्हें एक भरोसेमंद स्तंभ के रूप में देखा जाता है—ऐसा नेता, जो स्वयं आगे आने की बजाय कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ते देखना चाहता है।आज के दौर में, जब राजनीति में पद की होड़ और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा अक्सर प्राथमिक हो जाती है, डॉ. संजय मयूख जैसे नेता यह याद दिलाते हैं कि राजनीति केवल चुनाव लड़ने का नाम नहीं, बल्कि संगठन को सींचने, लोगों से जुड़े रहने और मूल्यों को जीवित रखने की सतत साधना भी है। यही वजह है कि उनका नाम बार-बार चर्चा में आता है—चुनाव के लिए नहीं, बल्कि भरोसे के लिए। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बने नितिन नवीन के पिताजी स्वर्गीय नवीन किशोर प्रसाद सिंहा से वर्ष 2000 में पहली बार संजय मयूख जी ने ही मुलाकात करवाई थी। उस समय पहली बार आज अखबार में हमारी एंट्री हुई थी और इलाका वही था गर्दनीबाग जक्कनपुर जो उस समय के पटना पश्चिम विधानसभा में आता था नरेंद्र भारती मॉडल हुआ करता था। संजय मयूर की बार-बार चर्चा इसलिए होती है कि जो लोग राजनीति में आने को उत्सुक है या राजनीति में आ चुके हैं उन्हें संघर्ष से नहीं घबराना चाहिए
#अनूप ना सिंह














