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वोटिंग के आंकड़ों ने तोड़ा नेताओं का भ्रमजाल, एमएलसी चुनाव में मतदाताओं ने सिखाया सबक

-वोटिंग के आंकड़ों ने तोड़ा नेताओं का भ्रमजाल, एमएलसी चुनाव में मतदाताओं ने सिखाया सबक

-शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में कई दिग्गजों को मिली शिकस्त
-निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी दिखाया दम
-नतीजों ने बदले राजनीतिक समीकरण

पटना/ललितेश्वर। बिहार विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की आठ सीटों के लिए संपन्न चुनाव ने कई राजनीतिक दिग्गजों के भ्रमजाल को तोड़ दिया है। चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ, लेकिन इसके नतीजों और मतदान के आंकड़ों ने साफ कर दिया कि मतदाताओं को किसी का निजी वोट बैंक मानना आसान नहीं है। मतदाताओं ने अपने फैसले से नेताओं को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का संदेश दिया है। इस चुनाव में कुछ स्थापित उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा, जबकि निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।

चुनाव परिणामों ने यह भी संकेत दिया कि राजनीतिक दलों की रणनीति, जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों तथा मतदाताओं को अलग-अलग खेमों में बांटने की कोशिशों के बावजूद अंतिम फैसला मतदाता ही करता है। हारने वाले उम्मीदवारों के साथ-साथ विजयी प्रत्याशियों के लिए भी ये नतीजे भविष्य की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में बदले समीकरण:

पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में राजद के डॉ. संजीव कुमार ने भाजपा के प्रोफेसर नवल किशोर यादव को 1,057 मतों से पराजित किया। डॉ. संजीव कुमार को 4,487 और नवल किशोर यादव को 3,430 वोट मिले। जनसुराज की दिव्या ज्योति 1,571 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।

सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में निर्दलीय राहुल राज ने जदयू के आनंद पुष्कर को 1,815 मतों से हराकर सबको चौंका दिया। राहुल राज को 4,965 और आनंद पुष्कर को 3,150 वोट मिले। जनसुराज के निवर्तमान एमएलसी अफाक अहमद को 2,454, जबकि राजद के जयराम यादव को 1,747 मत प्राप्त हुए।

तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा समर्थित नरेंद्र प्रसाद सिंह ने निर्दलीय भूषण कुमार झा को 1,311 मतों से शिकस्त दी। नरेंद्र प्रसाद सिंह को 3,662 और भूषण कुमार झा को 2,351 वोट मिले। भाकपा के निवर्तमान एमएलसी संजय कुमार सिंह 1,967 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। जनसुराज के श्यामनंदन यादव को 1,458 वोट मिले।

दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जनसुराज के सुरेश प्रसाद राय ने कांग्रेस के निवर्तमान एमएलसी डॉ. मदन मोहन झा को 1,111 मतों से हराया। सुरेश प्रसाद राय को 4,088 और डॉ. मदन मोहन झा को 2,977 वोट मिले। जदयू के घनश्याम राय को 862, जबकि राजद के कुमार राउत को 128 मत प्राप्त हुए।

स्नातक सीटों पर भी दिखा मतदाताओं का बदला मिजाज:

स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के परिणामों में भी कई महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश सामने आए। पटना स्नातक सीट पर जदयू के नीरज कुमार ने राजद के दिलीप कुमार को 4,655 मतों से पराजित किया। नीरज कुमार को 19,930 और दिलीप कुमार को 15,275 वोट मिले। जनसुराज के डॉ. अनुज सिंह को 11,278, जबकि कांग्रेस के असदुल्लाह खान को 971 मत प्राप्त हुए।

तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में निर्दलीय बंशीधर बृजवासी ने तमाम राजनीतिक घेरेबंदी को तोड़ते हुए शानदार जीत दर्ज की। उन्होंने जदयू के अभिषेक झा को 9,147 मतों से हराया। बंशीधर बृजवासी को 31,832 और अभिषेक झा को 22,685 वोट मिले। राजद की रश्मि विनायक गौतम 15,606 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं, जबकि जनसुराज के डॉ. विमोहन को 2,380 वोट मिले।

कोसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के निवर्तमान एमएलसी डॉ. एनके यादव ने अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखा। उन्होंने राजद के नितेश कुमार को 10,026 मतों से पराजित किया। डॉ. एनके यादव को 31,823 और नितेश कुमार को 21,797 वोट मिले। जनसुराज के रजनीश रंजन 16,264 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे, जबकि कांग्रेस के मनोज कुमार जायसवाल को 2,297 वोट मिले।

दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मुकाबला कड़ा रहा। यहां राजद के अनिल कुमार झा ने भाजपा के सर्वेश कुमार को पराजित किया। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों उम्मीदवारों के बीच मतों का आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया गया था।

भविष्य की राजनीति के लिए भी अहम संदेश:

आठों सीटों के चुनाव परिणामों ने राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को आत्ममंथन का अवसर दिया है। कहीं निवर्तमान एमएलसी को हार का सामना करना पड़ा, तो कहीं निर्दलीय प्रत्याशियों ने मजबूत संगठन और राजनीतिक दावों के बीच अपनी जीत दर्ज की। कई सीटों पर तीसरे उम्मीदवारों को मिले मतों ने भी मुकाबले की तस्वीर को प्रभावित किया।

इन नतीजों से स्पष्ट है कि शिक्षक और स्नातक मतदाता अपने मुद्दों, अपेक्षाओं और राजनीतिक पसंद के आधार पर फैसला लेने की क्षमता रखते हैं। मतदाताओं के इस बदले मिजाज को समझना अब राजनीतिक दलों के लिए जरूरी होगा। चुनाव ने एक बार फिर संदेश दिया है कि लोकतंत्र में मतदाता किसी नेता या दल की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि अपने विवेक से सरकार और जनप्रतिनिधियों को संदेश देने वाली सबसे बड़ी ताकत है।