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छठ पर्व से पहले बांस की वस्तुएं बनाने में जुटा डोम समुदाय, बढ़ती लागत और घटती मांग से पारंपरिक पेशे पर संकट

-छठ पर्व से पहले बांस की वस्तुएं बनाने में जुटा डोम समुदाय, बढ़ती लागत और घटती मांग से पारंपरिक पेशे पर संकट

जनकपुरधाम/मिश्री लाल मधुकर। मिथिला में लोक आस्था के महापर्व छठ की तैयारियां तेज होते ही डोम समुदाय के लोग बांस से बनी पारंपरिक वस्तुएं तैयार करने में जुट गए हैं। समुदाय के लोग सुबह से देर शाम तक सूप, डाला, छिट्टी, पनपतिया और अन्य पूजन सामग्री बनाने में लगे हैं। हालांकि, बांस की बढ़ती कीमत और उत्पादन लागत के बावजूद तैयार वस्तुओं की बिक्री कीमत में अपेक्षित वृद्धि नहीं होने से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हो पा रहा है।
छठ पर्व में बांस से बनी वस्तुओं का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। सूर्य को अर्घ्य देने के लिए प्रसाद रखने से लेकर पूजा सामग्री सजाने तक में सूप, डाला और छिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। हाथों से तैयार की जाने वाली ये वस्तुएं मिथिला की लोक संस्कृति और सदियों पुरानी परंपरा की पहचान हैं।


छठ नजदीक आते ही डोम समुदाय के घरों और आंगनों में बांस की वस्तुएं बनाने का काम तेज हो गया है। कारीगर पहले बांस को छोटी-छोटी पट्टियों में काटते हैं और फिर उन्हें अलग-अलग आकार देकर पारंपरिक तरीके से बुनाई करते हैं। दिनभर मेहनत के बाद तैयार सामान को बेचने के लिए बाजार पहुंचते हैं। पीढ़ियों से यह हुनर उनके परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन रहा है।
हालांकि, बदलते समय के साथ इस पारंपरिक पेशे पर संकट गहराने लगा है। छठ पूजा में अब बांस की वस्तुओं की जगह पीतल और अन्य धातुओं से बने सामानों का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। वहीं, बाहर से तैयार होकर आने वाली वस्तुओं से स्थानीय कारीगरों को बाजार में प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
बांस की बढ़ती कीमत, मेहनत के अनुरूप कम आमदनी और बाजार में बदलती पसंद के कारण डोम समुदाय का पारंपरिक शिल्प प्रभावित हो रहा है। ऐसे में मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को बचाने के साथ इस समुदाय के पारंपरिक हुनर और आजीविका को बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।