-डेढ़ सौ रुपये के उधार का विवाद 45 साल तक पहुंचा कोर्ट
-दोषी ठहराने के बाद 75 वर्षीय वृद्ध को चेतावनी देकर रिहा
मुजफ्फरपुर। महज 150 रुपये के उधार को लेकर शुरू हुआ विवाद आखिरकार करीब 45 साल बाद अदालत में अपने अंतिम मुकाम पर पहुंचा। लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-20 शरद चंद्र कुमार की अदालत ने मामले के एकमात्र जीवित बचे आरोपित भिखारी सहनी (75 वर्ष) को मारपीट और बंधक बनाने का दोषी पाया। हालांकि, उनकी वृद्धावस्था और मुकदमे की असाधारण लंबी अवधि को देखते हुए अदालत ने उन्हें जेल भेजने के बजाय आपराधिक परिवीक्षा अधिनियम के तहत चेतावनी देकर रिहा कर दिया।
यह मामला 5 मई 1981 की रात का है। गायघाट थाना क्षेत्र के एक गांव में रहने वाली कबूतरी मलाहिन ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, उसी दिन दोपहर में उनके बेटे लोढ़न सहनी ने गांव के ही भिखारी सहनी से 150 रुपये का पुराना उधार (पैंचा) मांगा था। इसी बात से नाराज होकर रात करीब 11 बजे भिखारी सहनी समेत कई लोग लाठी-डंडों से लैस होकर उनके घर पहुंच गए।

एफआईआर के मुताबिक, गाली-गलौज का विरोध करने पर कबूतरी मलाहिन के साथ मारपीट की गई। शोर सुनकर जब उनका बेटा लोढ़न सहनी बचाव के लिए आया तो भिखारी सहनी और महेंद्र सहनी ने उसके हाथ-पैर रस्सी से बांध दिए। आरोप है कि इसके बाद हमलावरों ने घर में आग लगा दी, जिससे चौखट, किवाड़, दो मन धान, एक मन गेहूं, खैनी, कपड़े समेत लगभग 2,500 रुपये की संपत्ति जलकर नष्ट हो गई।
घटना के बाद 5 मई 1981 को गायघाट थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई। पुलिस ने 14 जून 1981 को आरोप पत्र दाखिल किया और 17 जनवरी 1983 को अदालत ने आरोप तय किए। इसके बाद मामला चार दशक से अधिक समय तक अदालत में विचाराधीन रहा।
लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने भिखारी सहनी को मारपीट और बंधक बनाने का दोषी माना, लेकिन उनकी 75 वर्ष की आयु और करीब 45 वर्षों तक चले मुकदमे को देखते हुए मानवीय आधार पर जेल भेजने के बजाय चेतावनी देकर रिहा करने का आदेश दिया। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में अत्यधिक विलंब का भी एक उल्लेखनीय उदाहरण माना जा रहा है।












