-पूर्वांचल–बिहार की लोकसंस्कृति का आईना: आख़िरी सांसें गिनता लौंडा नाच
पूर्वांचल और बिहार की लोकसंस्कृति में कभी मनोरंजन, व्यंग्य और भावनाओं का जीवंत माध्यम रहा लौंडा नाच आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। इसका उद्भव कब और कैसे हुआ, इसका कोई प्रमाणिक इतिहास भले न मिले, लेकिन यह तय है कि यह नाच आम जनमानस के मनोरंजन से गहराई से जुड़ा रहा है।
इतिहास पर नजर डालें तो नृत्य की परंपरा अक्सर राजा–महाराजाओं और सामंतों के दरबारों तक सीमित रही। राजनर्तकियों, तवायफों और दरबारी कलाकारों के बीच आम लोगों के मनोरंजन के साधन सीमित थे। ऐसे में मध्यम और निम्न वर्ग के लिए लौंडा नाच का विकास हुआ, जहां पुरुष ही स्त्री वेश धारण कर नृत्य और गायन के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करते थे।
90 के दशक तक चरम पर रहा आकर्षण:
लौंडा नाच का क्रेज़ खासकर नब्बे के दशक तक चरम पर था। लोग लाठी और टॉर्च लेकर मीलों पैदल चलकर नाच देखने जाते थे। पूरी रात जागकर नाच देखते और फिर दिनभर थकान उतारते। ऐसे लोग “नचदेखवा” कहलाते थे। कई घरों में बुजुर्ग नाच देखने को अनुचित मानते थे, लेकिन युवाओं ने उनके प्रतिबंध का भी ‘जुगाड़’ निकाल लिया। चारपाई पर बिस्तर सजा कर सोने का भ्रम पैदा किया जाता और फिर चुपचाप नाच देखने निकल जाते।
नृत्य, नाटक और संगीत का संगम:
लौंडा नाच केवल नृत्य नहीं था, बल्कि इसमें गायन, प्रहसन और नाटक भी शामिल रहते थे। ग़ज़ल, ठुमरी, दादरा, चैती और कजरी जैसे शास्त्रीय लोकगीतों में ये कलाकार निपुण होते थे। ढोलक, हारमोनियम, तबला, नगाड़ा और झाल की थाप पर जब लौंडा थिरकता था, तो समां बंध जाता था।
बीच-बीच में जोकर हास्य प्रस्तुति देकर दर्शकों को बांधे रखते थे। नाटकों में धोबिया-धोबनियां, सुल्ताना डाकू, लैला–मजनूं जैसे कथानक मंचित होते थे।
भिखारी ठाकुर और ‘विदेसिया’ की अमिट छाप
भोजपुरी नाट्य जगत के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर ने लौंडा नाच को नई ऊंचाई दी। उनकी नाच मंडली और ‘विदेसिया’ नाटक ने लोकसंस्कृति को नई पहचान दी। विदेशिया मूलतः नाटक था, लेकिन उसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि वही एक नृत्य शैली बन गई। भिखारी ठाकुर अनुशासन के लिए जाने जाते थे और मानते थे कि कलाकार का काम बोले, न कि अखबारों में बयान।

बदलता समय, सिमटता अस्तित्व:
समय के साथ फिल्मी गीतों और कैसेटों का चलन बढ़ा। इससे लौंडा नाच की शास्त्रीय गायन परंपरा धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई। अब मंच पर लाइव गायन की जगह फिल्मी गाने बजने लगे।
इसके साथ ही नेपाल और बांग्लादेश से आई महिला कलाकारों के कारण पारंपरिक पुरुष नचनियों की भूमिका सिमटती चली गई। हालात ऐसे हो गए कि कई कलाकारों के बच्चे अपने पिता की पहचान बताने में शर्म महसूस करने लगे। कुछ कलाकार बुढ़ापे में दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गए।
सम्मान की लड़ाई लड़ता लोकनृत्य:
विडंबना यह है कि जिस समाज ने लौंडा नाच को जन्म दिया, वही आज उससे मुंह मोड़ रहा है। डीजे और आर्केस्ट्रा के दौर में यह लोकनृत्य अप्रासंगिक माना जाने लगा है। कभी राजनीति के मंचों और रैलियों में आकर्षण का केंद्र रहा लौंडा नाच आज संरक्षण की बाट जोह रहा है।
लौंडा नाच सिर्फ एक नाच नहीं, बल्कि समाज का इतिहास, संघर्ष और संवेदना है। यदि समय रहते इसे संरक्षित नहीं किया गया, तो यह समृद्ध लोकपरंपरा केवल किताबों और यादों तक सिमट कर रह जाएगी।
“आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक,
ख़ाक हो जाएंगे हम तुमको ख़बर होने तक।”














