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स्पेशल: बिहार के मिथिलांचल में संतान की दीर्घायु के लिए कठिन जिउतिया व्रत की परंपरा

स्पेशल: बिहार के मिथिलांचल में संतान की दीर्घायु के लिए कठिन जिउतिया व्रत की परंपरा

आलेख: दीपक कुमार तिवारी।

बिहार के मिथिलांचल के ग्रामीण इलाकों में माताएं संतान की दीर्घायु, सुरक्षा और उनके सुखी जीवन के लिए हर वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर जिउतिया व्रत रखती हैं।यह व्रत बिहार सहित देश के अन्य हिस्सों में भी मनाया जाता है।लेकिन मिथिलांचल के हिस्सों में इसे काफी कठिनतम तरीकों से मनाया जाता है। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत महिलाओं द्वारा संतान की मंगलकामना हेतु रखा जाता है, जो पूर्ण रूप से निर्जला व्रत होता है और यह व्रत 24 घंटे तक चलता है।

पर्व की शुरुआत और नहाय-खाय:

इस वर्ष जिले में यह पर्व सोमवार से नहाय-खाय के साथ प्रारंभ है। मंगलवार को महिलाएं निर्जला व्रत प्रारंभ करेंगी, जो गुरुवार को संध्या पूजा के उपरांत संपन्न होगा। इस दौरान बाजारों में पर्व की तैयारी जोरों पर रही, जहां जिउतिया पर्व की पूजन सामग्री, फल, दूध-दही, साग-सब्जी और मछली की खरीदारी धूमधाम से की गई। मिथिलांचल की विशेष परंपराओं में से एक मड़ुआ की रोटी और मछली खाने की प्रथा भी जिउतिया पर्व से जुड़ी हुई है।

ओटगन की परंपरा:

जिउतिया व्रत के प्रारंभ में ओटगन की परंपरा निभाई जाती है। इसमें लोग दही-चूड़ा खाते हैं, जिससे बाजार में दही और दूध की भारी मांग देखी गई। सुबह से ही लोग दही और चूड़ा खरीदने के लिए बाजारों में उमड़ पड़े थे। इस दिन परिवार के सभी सदस्य सूर्योदय से पहले उठकर ओटघन के रूप में दही-चूड़ा का प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसके बाद व्रत प्रारंभ होता है।

व्रत की कठिनाई और महत्व:

जिउतिया व्रत को सबसे कठिन व्रत माना जाता है क्योंकि महिलाएं बिना अन्न-जल के यह व्रत करती हैं। इस दौरान महिलाएं अपनी संतान की रक्षा और समृद्धि के लिए नारियल, साग और फलों को एक विशेष रूप से सजे हुए डाली में सजाती हैं और कथा का श्रवण करती हैं। इस कथा में चील और सियार की पौराणिक कहानी सुनाई जाती है। व्रत के दूसरे दिन पुत्रों द्वारा डाली के लाल कपड़े को हटाया जाता है, जिसके बाद महिलाएं प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत खोलती हैं।

 

खरजीतिया का दुर्लभ संयोग:

इस वर्ष जिउतिया पर्व के साथ खरजीतिया का दुर्लभ संयोग भी बना है। यह संयोग तब बनता है जब अष्टमी तिथि मंगलवार या शनिवार को होती है। खरजीतिया के संयोग में पहली बार महिलाएं व्रत करती हैं, और यह माना जाता है कि इस व्रत को करने से संतान की अकाल मृत्यु नहीं होती। यह पर्व स्त्रियों के लिए किसी तपस्या से कम नहीं है, और इस दौरान किसी भी प्रकार के अन्न या जल का सेवन नहीं किया जाता।

पूजन विधि और कथा:

व्रत के दिन महिलाएं जीमुतवाहन भगवान की पूजा करती हैं, जो इस व्रत का मुख्य देवता है। पूजा के लिए महिलाएं अपने आंगन में एक पाखर का पौधा लगाती हैं, और गोबर-मिट्टी से बनी चील और सियार की मूर्तियों को स्थापित करती हैं। पूजन के बाद जीमुतवाहन भगवान की कथा का श्रवण किया जाता है, जिसमें वंशवृद्धि और संतान की सुरक्षा के लिए बांस के पत्तों से पूजा की जाती है।

निष्कर्ष:

जिउतिया व्रत एक महत्वपूर्ण और कठिन धार्मिक परंपरा है, जिसमें माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और समृद्धि के लिए उपवास करती हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि समाज में संतान के प्रति माताओं के प्रेम और त्याग का प्रतीक भी है।