2025 में भाजपा के निशाने पर सीएम पद
-नीतीश के कार्यों पर भरोसा करें, कसमों पर नहीं
आलेख: दीपक/अनूप।
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार एक ऐसा नाम है, जो लगातार सत्ता की कुर्सी पर बने रहने की कला में माहिर हैं। नौ बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके नीतीश कुमार के लिए कुर्सी ही सबसे बड़ी प्रतिबद्धता रही है। उनके राजनीतिक सफर में विचारधारा की जगह सत्ता की समीकरणों ने अहम भूमिका निभाई है, चाहे वह भाजपा के साथ गठबंधन हो या राजद के साथ। एक ओर जहां उन्होंने बिहार के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है, वहीं दूसरी ओर उनकी कसमों और वादों की निरंतरता हमेशा सवालों के घेरे में रही है।
नीतीश कुमार के विरोधी भी मानते हैं कि उनके कार्यकाल में बिहार में सड़क, बिजली, और स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार हुआ है। लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद, उनके राजनीतिक निर्णय अक्सर विवादास्पद रहे हैं। 2014 में भाजपा से अलग होकर राजद के साथ जाने और फिर भाजपा के साथ पुनः गठबंधन करने की घटनाएं उनके राजनीतिक चरित्र की गहराई को दिखाती हैं। उन्होंने कई बार कसम खाई कि वह अब भाजपा के साथ नहीं जाएंगे, परंतु जब-जब उनकी कुर्सी पर संकट मंडराया, वह बिना देर किए अपने पुराने साथी के पास लौट आए।
2020 के विधानसभा चुनाव के बाद, भाजपा ने जदयू के स्पीकर पद को छीन लिया था, जिससे स्पष्ट हो गया कि नीतीश अब पहले जैसे सुरक्षित नहीं हैं। 2025 के चुनावों में भाजपा की बढ़त नीतीश कुमार के लिए खतरे का संकेत है। यदि भाजपा चुनाव में कुछ और विधायक बढ़ा लेती है, तो सीएम पद भी उनसे छिन सकता है। नीतीश की पार्टी और स्वयं नीतीश इस संभावित परिदृश्य से भयभीत हैं, और यही कारण है कि उनके राजनीतिक प्रस्तावों में एनडीए की बातें प्रमुखता से दिखने लगी हैं।

नीतीश कुमार की राजनीति का यह सफर स्पष्ट करता है कि उनके विकास कार्यों पर भरोसा किया जा सकता है, लेकिन उनकी कसमों और वादों पर नहीं। सत्ता में बने रहने के लिए वह बार-बार अपनी प्रतिबद्धताएं बदलते रहे हैं, और आने वाले दिनों में भी उनकी यही रणनीति जारी रहने की संभावना है।















