-सोनपुर मेले से जुड़ी है इस तवायफ की कहानी
…गुलजारी बाई उर्फ ढेला बाई बहुते बीमार थी. महेंद्र मिसिर जेल से छूट कर आए थे. खबर मिली. अधीर हो गये. दौड पडे मिलने…मिसिर जी को सामने पाकर ढेला बाई यातना और इंतज़ार की पीड़ा भुल गयी… झर-झर आंसू बहने लगे. प्रेम की निश्छल स्वीकृति के आंसू. लगा कि मीरा को प्रेम के झील में कृष्ण मिल गये. लरजते आंसूओ के बीच कांपते हाथ जोड़ कर बोली- बाबा! खुशकिस्मत हूं बस! मेरे लिए कुछ गा दीजिए…उलझन मे पड़े परेशान मिसिर जी रोक न सके…सहज अंगीकार भाव से सराबोर आंखों से आंसू बहने लगे…सब्स्टीट्यूट नहीं था. काबू किए भावनाओं पर…भौतिक रूप से न सही. अध्यात्मिक तौर पर सुहागिन बनाने के लिए मिसिर जी के ह्रदय से विरह गीत फूटा-
माया के नगरिया मे लागल बा बजरिया हे सुहागिन सुन ना…
गीत और धुन डूइंग नही बीइंग था…होने की क्षण की अभिव्यक्ति. मिसिर जी गाते रहे…गीत सुनते हुए ढेलाबाई के आंखों के आंसू सूख गये…तृप्ति का भाव लिए ढेला बाई की आंखें हमेशा लिए बंद हो गयी….
मिसिर जी रंगीन भोजपुरिया जवान थे. एक रंग मे उनको नही देखा जा सकता. ढेलाबाई मुगलिया सल्तनत मे खानदानी तवायफ परम्परा की वारिस थी. अपने समय की चर्चित और बला की खुबसूरत …राजरानी थी. महेंद्र मिसिर के सामने राजरानी झुके तो कुछ बात रही होगी…
कहते है कि मिसिर जी के तबले की थाप पर ढेला बाई के अदायगी की झंकार…एकबारगी वाजिद अली शाह की महफिल हिल जाय. मिसिर जी अवध के नवाब होते तो ढेला बाई को बेगम हजरत महल बनाने से चुकते नही. यह अलग बात है कि तवायफों के कोठे से ही कत्थक, हिन्दुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक, गज़ल, ठुमरी जैसी संगीत परम्परा निकलकर आयी. मिसिर जी इन सबके क्लासिक उस्ताद थे. यह उस्तादी ही भोजपुरिया समाज ने उन्हें “कुजात’ बना दिया.

देवदास उपन्यास के लेखक शरदचंद्र चटोपाध्याय और महेन्द्र मिसिर दोनो मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज स्थान जाने वाले राह के बटोही थे. शरद बाबू के बिहार छोड़ने से पहले मिसिर जी का सिक्का वहां जम चुका था. फर्क इतना था कि शरद बाबू शब्दों के जादूगर थे. मिसिर जी कहन-गायन और बजायन शैली के उस्ताद बने.
मिसिर जी गांधी जी के आंदोलनों के राह के राही रहे. लेकिन वैचारिक तालमेल नही बैठ सका. भगत सिंह के क्रांतिकारी संगठन के सक्रिय सदस्य बन गए. तब, तवायफों के कोठे क्रांतिकारियों के रणनीतिक सूचनाओं के सुरक्षित ठिकाने थे. आजादी के इतिहास भी हमने जाति-विरादरी देख कर लिखा है. आजादी के आंदोलन मे महिलाओं खासकर कोठे वाली तवायफों की योगदानों की चर्चा होने पर क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास मे काफी कुछ नया जानने को मिलेगा.
तवायफों को रसूख से जीने का हक़-हकूक मिले. इसके लिए मिसिर जी के प्रयास सर्वाधिक आकषिर्त करते है. न जाने कितने तवायफों को नाच- गाने और गीत-संगीत की तहजीब सीखाने मिसिर जी बनारस, लखनऊ, कोलकाता, कानपुर और पटना तक गये. सोनपुर मेले के मिसिर जी स्टार हुआ करते थे. तवायफें भी उनपर जान छिडकती थी. मिसिर जी को जेल से छुडाने के लिए अन्य के साथ ढेला बाई ने अपना नथिया तक बेच डाला.
महिलाओं की इज्ज़त और रसूख की रक्षा
के लिए महेंद्र मिसिर के साथ भिखारी ठाकुर को भी सैल्यूट करना चाहिए. भोजपुरिया समाज मे भिखारी ठाकुर पहले साहसी थे, जो जमींदारों के दरवाजे पर नाच-मंडली लगा कर उन्हीं के खिलाफ “बेटी बेचवा’ का मंचन करते थे. मिसिर जी और भिखारी ठाकुर दोनो अपने समय मे सामाजिक और सांस्कृतिक विद्रोही थे. भोजपुरिया समाज के कुछ ज्ञानी भिखारी ठाकुर को मिसिर जी का चेला बताने मे लगे है.यह उसी तरह विचित्र है, जिस तरह कबीर-रैदास को पंडित रामानंद का चेला बताने मे खंचिया भर निर्रथक हिंदी साहित्य रच डाले.
जमींदारी प्रथा ने ऐसी समाजिक-संस्कृति को मान्यता दी. जहां ब्राह्मण कुल मे जन्मे महेंद्र मिसिर “नचनिया-बजनिया’ बन गये…भिखारी ठाकुर “न-उ-आ के नाच’ बनकर रह गये. गहरे अर्थो मे दोनों की प्रतिभाएं सामाजिक मान्यताओ की शिकार हो गयी.
महेंद्र मिसिर के जीवन-निचोड इतना भर है कि स्त्री जब समाजिक रिश्ते मे नही होती तो वह तवायफ हो जाती है. पुरूष वर्णवादी खांचे से बाहर जाकर जीना चाहता है तो वह “कुजात’ हो जाता है.
# अनूप
















