-संस्कार किताबों से नहीं, व्यवहार से मिलते हैं
आलेख: दीपक कुमार तिवारी।
आज के दौर में माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा, बेहतर स्कूल और आधुनिक सुविधाएं देने में कोई कसर नहीं छोड़ते। लेकिन एक बात अक्सर भूल जाते हैं कि बच्चों का सबसे बड़ा विद्यालय उनका अपना घर होता है और उनके पहले शिक्षक उनके माता-पिता होते हैं। बच्चे कानों से कम और आंखों से अधिक सीखते हैं। वे वही बनते हैं, जो अपने घर में रोज़ देखते हैं।
एक छोटी-सी घटना इस सच्चाई को बेहद प्रभावशाली ढंग से समझाती है। एक पिता अपने बेटे को साइकिल से स्कूल छोड़ने जा रहा था। रास्ते में उसकी साइकिल गलती से एक खड़ी साइकिल से टकरा गई, जिस पर दूध की केतलियां टंगी थीं। सारा दूध सड़क पर बिखर गया। आसपास कोई नहीं था। वह चाहता तो बिना रुके वहां से निकल सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसने बेटे से कहा कि हम यहीं रुकेंगे और दूध वाले का इंतजार करेंगे, क्योंकि नुकसान हमने किया है।

जब दूध वाला लौटा तो पिता ने बिना किसी झिझक के अपनी गलती स्वीकार की और नुकसान की भरपाई करने की बात कही। दूध वाला यह देखकर हैरान रह गया कि जब किसी ने देखा ही नहीं था, तब भी वह व्यक्ति भागा नहीं। पिता का जवाब था कि अगर वह भाग जाता तो उसका बेटा यही सीखता कि जब कोई देख न रहा हो, तब गलत काम करना ठीक है।
यही वह पल था जिसने केवल बेटे को ही नहीं, बल्कि दूध वाले को भी बदल दिया। उसने स्वीकार किया कि वह अक्सर अपने बच्चों के सामने दूध में पानी मिलाता था। उस दिन उसे एहसास हुआ कि उसके बच्चे भी उसी से ईमानदारी और बेईमानी का फर्क सीख रहे हैं। उसने संकल्प लिया कि अब कभी मिलावट नहीं करेगा।
यह घटना बताती है कि संस्कार उपदेशों से नहीं, उदाहरणों से दिए जाते हैं। ईमानदारी, जिम्मेदारी, सत्य और नैतिकता का पाठ बच्चों को भाषण देकर नहीं, बल्कि अपने आचरण से सिखाया जाता है। माता-पिता का हर छोटा-बड़ा व्यवहार बच्चों के व्यक्तित्व की नींव बनता है।
आज समाज में यदि ईमानदार, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक चाहिए, तो इसकी शुरुआत घर से करनी होगी। बच्चों को अच्छे संस्कार देने का सबसे प्रभावी तरीका यही है कि बड़े स्वयं वैसा आचरण करें, जैसा वे अपने बच्चों में देखना चाहते हैं। क्योंकि बच्चे वही नहीं करते जो उन्हें बताया जाता है, बल्कि वही करते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं।
याद रखिए, बच्चों के लिए सबसे बड़ी सीख आपके शब्द नहीं, आपका चरित्र होता है।















