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शिक्षा का रहस्य है बच्चों के व्यक्तित्व का सम्मान करना : दिलीप बेतकेकर

-शिक्षा का रहस्य है बच्चों के व्यक्तित्व का सम्मान करना -दिलीप बेतकेकर

भागलपुर से शशि भूषण मिश्र की रिपोर्ट ।

दिनांक 15 जून 2024 दिन शनिवार को भारती शिक्षा समिति एवं शिशु शिक्षा प्रबंध समिति के तत्वावधान में सैनिक स्कूल गणपतराय सलारपुरिया सरस्वती विद्या मंदिर नरगाकोठी में चल रहे नवीन आचार्य प्रशिक्षण वर्ग के 14वें दिवस का प्रारंभ विद्या भारती के पूर्व उपाध्यक्ष दिलीप बेतकेकर, सचिव प्रदीप कुमार कुशवाहा, पटना के विभाग निरीक्षक रमेश मणि पाठक, वर्ग के प्रधानाचार्य सतीश कुमार सिंह ,रजौली के प्रधानाचार्य जितेंद्र प्रसाद ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया।
दिलीप बेतकेकर ने कहा कि किसी भी चीज को बारीकी से ,गहराई से देखते हैं ,विभिन्न दिशाओं से देखते हैं, बार-बार अध्ययन करेंगे ,सोचेंगे ,विचार करेंगे तो उससे उसकी गहराई का पता चलता है, तरह-तरह की बातें सामने आती है, कुछ नई बातें उभर कर आती है। शिक्षक दो प्रकार के होते हैं एक शिक्षक जिसके कक्षा में प्रवेश करते ही बच्चे खुश हो जाते हैं दूसरे शिक्षक जिसके कक्षा से निकलने पर बच्चे खुश होते हैं। आपके बारे में बच्चा क्या सोचते हैं इसे समझना होगा। जो शिक्षक बच्चों को अच्छा लगता है उसका विषय भी बच्चों को अच्छा लगता है। शिक्षा का रहस्य है बच्चों के व्यक्तित्व का सम्मान करना। अध्यापक का हृदय अगर मातृत्व वाला है चाहे पुरुष अध्यापक हो या महिला अध्यापक तभी वह सफल अध्यापक हो सकता है। कक्षा में हमारे सामने बच्चे बैठे हैं उन बच्चों के कारण ही हम विद्यालय में हैं इसलिए हमें बच्चों के प्रति कृतज्ञता रखनी चाहिए।
श्रेय आईएएस कोचिंग संस्था के संस्थापक दुर्गेश ठाकुर ने कहा कि अगर पढ़ना आपका कर्तव्य है तो कैसे पढ़ाया जाए यह भी आपका कर्तव्य है। शिक्षा और शिक्षक दोनों में अन्योन्याश्रय संबंध है लेकिन शिक्षक और गुरु में बहुत बड़ा अंतर है। शिक्षक का मतलब होता है मास्टर या उस्ताद जो किसी खास विषय में जानकारी रखने वाला होता है लेकिन गुरु का मतलब है सभी विषयों में जानकारी रखने वाला। सभी रूपों से सर्वमान्य ,सर्वगुण संपन्न होते थे वही गुरु कहलाते थे। शिक्षक मैकाले शिक्षा पद्धति से शुरू हुआ गुरु अपने प्राचीन काल से आ रहा है। गुरु को चिंतनशील होना चाहिए। गुरु का एक ही काम है अज्ञानी को ज्ञान देना। ज्ञान का मतलब होता है संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करना। विपरीत परिस्थितियों में जो सहजता पूर्वक काम करता है वह नायक होता है। हमें शिक्षक नहीं गुरु बनने का प्रयास करना है।

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इस अवसर पर उमाशंकर पोद्दार, राकेश नारायण अम्बष्ट,ब्रह्मदेव प्रसाद, रामचंद्र आर्य ,राजेश कुमार ,परमेश्वर कुमार, वीरेंद्र कुमार ,गंगा चौधरी, संजीव पाठक ,शशि भूषण मिश्र, आलोक कुमार ,सुजीत कुमार गुप्ता, चंद्रशेखर कुमार, साकेत कुमार ,सत्येंद्र कुमार एवं प्रशिक्षणार्थी उपस्थित थे।