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विकास की आंधी में गुम हैं लोक-कल्याणकारी योजनाएँ, जनता में बढ़ा आक्रोश

-विकास की आंधी में गुम हैं लोक-कल्याणकारी योजनाएँ, जनता में बढ़ा आक्रोश

मुजफ्फरपुर।दीपक तिवारी।

बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 की आहट तेज हो चुकी है। नेताओं के भाषणों में विकास की गूंज सुनाई देती है, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही तस्वीर पेश करती है। लोक-कल्याण से जुड़ी कई घोषणाएँ और परियोजनाएँ वर्षों से उपेक्षा की शिकार हैं।

रतवारा-ढोली घाट पुल निर्माण का सपना अधूरा:

वर्ष 2018 में तत्कालीन पथ निर्माण मंत्री नंदकिशोर यादव ने गायघाट और सकरा विधानसभा क्षेत्र की किस्मत बदलने वाले रतवारा-ढोली घाट पुल निर्माण की घोषणा की थी। ग्रामीणों ने उम्मीद जताई थी कि इस पुल से रोजगार, शिक्षा और व्यापारिक गतिविधियों में नई राह खुलेगी। लेकिन विडंबना यह है कि न तो आज तक निर्माण कार्य शुरू हुआ और न ही इस पर दोबारा कोई औपचारिक घोषणा हुई। सरकार बदली,विधायक-सांसद बदले,लेकिन समस्याओं का समाधान नहीं हुए। अब ग्रामीणों में गहरा आक्रोश है और वे चुनाव में इसका हिसाब लेने की तैयारी कर रहे हैं।

बंद पड़ा मातृ-शिशु मेमोरियल अस्पताल:

मुरौल प्रखंड के पिलखी गजपति स्थित रामदुलारी मिट्ठू लाल चौधरी मातृ-शिशु मेमोरियल राजकीय अस्पताल पर 4.6 करोड़ रुपये खर्च हुए। भव्य भवन तैयार हुआ और उद्घाटन भी कर दिया गया। लेकिन आज तक अस्पताल में ताले लटक रहे हैं। न डॉक्टर हैं, न स्वास्थ्य सेवाएँ। अगर सरकार चाहती तो निजी साझेदारी या निविदा प्रक्रिया के जरिए अस्पताल को संचालित किया जा सकता था। नतीजतन हजारों गरीब परिवार बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा से वंचित हैं।

जनता का सवाल — विकास की बातें कहाँ तक सच्ची?

यह केवल दो उदाहरण हैं। वास्तविकता यह है कि विकास की चमक-दमक के बीच आमजन के लिए बनाई गई योजनाएँ हाशिये पर धकेल दी गई हैं। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब करोड़ों की लागत वाली योजनाएँ धरातल पर नहीं उतर पातीं, तो नेताओं के वादों पर कैसे भरोसा किया जाए?

आगामी चुनाव में जनता का यह असंतोष नेताओं के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।