-भाजपा में शामिल होने की खबरों के बाद पलटे बंशीधर ब्रजवासी, आनंद पुष्कर ने उठाए गठबंधन धर्म पर सवाल
-तिरहुत स्नातक सीट के निर्दलीय एमएलसी ने वीडियो जारी कर सदस्यता से किया इनकार
-सारण में जदयू की हार को लेकर भाजपा नेताओं की भूमिका पर भी उठे सवाल
मुजफ्फरपुर। बिहार विधान परिषद चुनाव में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जीत दर्ज करने वाले निर्दलीय विधान पार्षद बंशीधर ब्रजवासी के भाजपा में शामिल होने को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। शनिवार को भाजपा प्रदेश कार्यालय में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी की मौजूदगी में उनके पार्टी में शामिल होने की खबर सामने आई थी। हालांकि, देर रात वीडियो जारी कर ब्रजवासी ने भाजपा की सदस्यता लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वह मुख्यमंत्री से शिक्षकों के मुद्दों पर मिलने गए थे। इस घटनाक्रम के बीच सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जदयू के पराजित प्रत्याशी आनंद पुष्कर ने भाजपा के कुछ नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाते हुए गठबंधन धर्म के पालन पर बहस छेड़ दी है।
भाजपा में शामिल होने की खबरों पर ब्रजवासी की सफाई:
शनिवार को भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम के बाद बंशीधर ब्रजवासी ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि मुख्यमंत्री ने उन्हें शिक्षक हितों के लिए पार्टी के साथ मिलकर काम करने की सलाह दी है। उन्होंने यह भी कहा था कि अकेले रहकर शिक्षकों के सभी मुद्दों का समाधान कराना संभव नहीं है।
हालांकि, देर रात जारी वीडियो में उन्होंने भाजपा की सदस्यता लेने से इनकार करते हुए कहा कि वह मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से शिक्षकों से जुड़े मुद्दों पर मिलने गए थे। उन्होंने अपने समर्थकों और शिक्षकों से भरोसा बनाए रखने की अपील की और कहा कि वह पहले की तरह शिक्षकों के हितों के लिए काम करते रहेंगे।
वहीं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने बाद में कहा कि दोनों निर्दलीय विधान पार्षदों ने पार्टी को समर्थन दिया है। इस तरह ब्रजवासी की औपचारिक सदस्यता और भाजपा को समर्थन देने के मुद्दे पर अलग-अलग बयान सामने आने से राजनीतिक स्थिति और चर्चा में आ गई है।
आनंद पुष्कर ने रूडी और राधा मोहन सिंह पर उठाए सवाल:
इस घटनाक्रम पर जदयू के पराजित प्रत्याशी आनंद पुष्कर ने सोशल मीडिया पर विस्तृत पोस्ट साझा कर भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी और मोतिहारी के सांसद राधा मोहन सिंह की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या गठबंधन धर्म का पालन करने की जिम्मेदारी सिर्फ जदयू की है?

पुष्कर ने कहा कि जब भाजपा नेताओं को अपने चुनाव में समर्थन की जरूरत होती है, तब वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में हुए विकास कार्यों का उल्लेख करते हैं। लेकिन सहयोगी दल के प्रत्याशियों के पक्ष में खड़े होने की बारी आने पर गठबंधन धर्म की मर्यादा कहां चली जाती है? उन्होंने सवाल किया कि गठबंधन के सिद्धांतों का पालन केवल अपने चुनाव के दौरान होना चाहिए या सहयोगी दल के प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं के समर्थन के समय भी इसकी जिम्मेदारी निभाई जानी चाहिए।
खुद को जदयू का पुराना कार्यकर्ता बताते हुए पुष्कर ने कहा कि वह पहले भी पार्टी के सिपाही थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे।
चुनावी वादे पूरे नहीं होने का लगाया आरोप:
आनंद पुष्कर ने आरोप लगाया कि चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि मौजूदा विधान पार्षद को चुनाव लड़ने से रोक लिया जाएगा और वह गठबंधन के फैसले को स्वीकार करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और संबंधित उम्मीदवार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतर गए।
उन्होंने यह भी दावा किया कि एनडीए की बैठक में नेताओं और जनप्रतिनिधियों को विद्यालयों का दौरा कर शिक्षकों से संवाद करने तथा गठबंधन प्रत्याशियों के पक्ष में समर्थन जुटाने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके बावजूद भाजपा के कई सांसदों और विधायकों ने अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई। पुष्कर के इन आरोपों से चुनाव के दौरान सहयोगी दलों के बीच तालमेल को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
तिरहुत और सारण में निर्दलीय प्रत्याशियों ने जदयू को दी थी शिकस्त:
विधान परिषद चुनाव के नतीजे इस विवाद की प्रमुख वजह हैं। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में निर्दलीय प्रत्याशी बंशीधर ब्रजवासी ने जदयू समर्थित उम्मीदवार अभिषेक झा को 9,147 मतों से पराजित किया था। ब्रजवासी को 31,832 वोट मिले थे, जबकि अभिषेक झा को 22,685 मत प्राप्त हुए थे।
वहीं, सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में निर्दलीय प्रत्याशी राहुल राज ने जदयू के आनंद पुष्कर को हराया था। चुनाव के बाद दोनों विजयी निर्दलीय प्रत्याशियों के भाजपा कार्यालय पहुंचने और उनके पार्टी से जुड़ने की खबरों ने एनडीए के भीतर राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया।
अब ब्रजवासी के भाजपा की औपचारिक सदस्यता लेने से इनकार और आनंद पुष्कर के आरोपों के बाद बिहार की राजनीति में गठबंधन के भीतर समन्वय और चुनावी तालमेल को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।












