Advertisement

बिहार की राजनीति: नीतीश से निशांत तक — सत्ता परिवर्तन की नई पटकथा

–बिहार की राजनीति: नीतीश से निशांत तक — सत्ता परिवर्तन की नई पटकथा

आलेख:दीपक कुमार तिवारी।

बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। दो दशक तक राज्य की सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार अब राज्यसभा की ओर बढ़ रहे हैं और साथ ही उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री की तैयारी हो रही है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बिहार में अपने मुख्यमंत्री बनाने की रणनीति पर काम करती दिख रही है। यह घटनाक्रम सिर्फ एक पद परिवर्तन नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के भूत, वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करने वाला बड़ा राजनीतिक संक्रमण है।
2005 में जब नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब बिहार की राजनीति जातीय ध्रुवीकरण और प्रशासनिक अव्यवस्था से जूझ रही थी। “सुशासन” की राजनीति के साथ उन्होंने विकास और सामाजिक संतुलन की नई कहानी लिखने का प्रयास किया।
उनकी कई मुख्य विशेषताएँ रहीं। सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़े सुधार हुए।
महिला सशक्तिकरण (पंचायतों में 50% आरक्षण, साइकिल योजना) की गई।
अति पिछड़ा वर्ग और महादलित राजनीति को नया राजनीतिक आधार मिला। इसी दौर में भाजपा के साथ गठबंधन कर उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 243 में से 202 सीटें जीतकर बड़ी जीत हासिल की, जिसमें भाजपा पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनी। यहीं से बिहार की राजनीति में शक्ति संतुलन धीरे-धीरे भाजपा की ओर झुकने लगा।हाल के घटनाक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का फैसला किया है, जिससे बिहार की राजनीति में नए समीकरण बनने लगे हैं।
इसके साथ ही तीन बड़े संकेत सामने आए हैं।नीतीश का “दिल्ली शिफ्ट” होंगे।राज्यसभा जाने के बाद उनकी भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ सकती है। यह भी संभावना है कि उन्हें केंद्र में कोई जिम्मेदारी मिले।
दूसरी निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री होगी।नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार 8 मार्च 2026 को जदयू में औपचारिक रूप से शामिल होने वाले हैं।
जदयू के कई नेताओं का मानना है कि उनकी एंट्री पार्टी को एकजुट रखने में मदद कर सकती है।
वहीं भाजपा का मुख्यमंत्री कार्ड सामने है।
नीतीश के दिल्ली जाने की स्थिति में भाजपा का मुख्यमंत्री बनने की चर्चा तेज है। कई नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं।
इससे स्पष्ट है कि बिहार की सत्ता संरचना बदलने की तैयारी में है।
2025 चुनाव के बाद भाजपा बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी अब राज्य में अपना मुख्यमंत्री स्थापित करना चाहती है।
इसके कई संभावित कारण माने जा रहे हैं।भाजपा का बढ़ता संगठनात्मक आधार,
2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी एवं जदयू की नेतृत्व पीढ़ी में बदलाव।
अगर भाजपा मुख्यमंत्री बनाती है तो यह 2005 के बाद बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन होगा।
निशांत कुमार लंबे समय तक राजनीति से दूर रहे, लेकिन अब उनकी एंट्री को जदयू में नेतृत्व संक्रमण के रूप में देखा जा रहा है।


उनकी संभावित भूमिकाएँ होंगी।जदयू संगठन में महत्वपूर्ण पद,
भविष्य में चुनावी राजनीति,
नीतीश की राजनीतिक विरासत को संभालना उनकी अहम जिम्मेवारियों में शामिल होगा।
हालाँकि बिहार की राजनीति में वंशवाद को लेकर हमेशा बहस रही है, इसलिए निशांत के सामने चुनौती भी कम नहीं होगी।वहीं विपक्ष की रणनीति भी बदलेगी।
विपक्षी दल भी इस बदलाव को अवसर की तरह देख रहे हैं।
नीतीश के दिल्ली जाने की स्थिति में विपक्ष नई रणनीति बनाने की तैयारी में है।
खासकर तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली आरजेडी,
कांग्रेस और वाम दल के लोग सामाजिक समीकरणों को फिर से साधने की कोशिश करेंगे।
ऐसे में आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति तीन दिशाओं में जा सकती है।
भाजपा का मुख्यमंत्री मॉडल लागू होने से भाजपा मजबूत होकर राज्य की राजनीति का मुख्य केंद्र बन सकती है।
वहीं जदयू का नया नेतृत्व
निशांत कुमार या कोई नया नेता जदयू को आगे बढ़ा सकता है।
वहीं त्रिकोणीय राजनीति के केंद्र में भाजपा, जदयू और आरजेडी के बीच नई राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बन सकती है।
निष्कर्षतः बिहार की राजनीति इस समय एक ऐतिहासिक संक्रमण से गुजर रही है।
नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना, निशांत कुमार की एंट्री और भाजपा की मुख्यमंत्री रणनीति—इन तीनों घटनाओं ने मिलकर सत्ता की नई पटकथा लिखनी शुरू कर दी है।
संभव है कि आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति “नीतीश युग” से “नए नेतृत्व युग” की ओर बढ़े।
लेकिन एक बात तय है—बिहार की राजनीति में आखिरी फैसला हमेशा जनता और सामाजिक समीकरण ही करते हैं।