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बिहार की राजनीति के ‘किंगमेकर’ या ‘किंग’?”

“नीतीश कुमार: बिहार की राजनीति के ‘किंगमेकर’ या ‘किंग’?”

-“लालू प्रसाद का खुले दरवाजे का न्योता, तेजस्वी का विरोध, और भाजपा-आरजेडी की मजबूरियां
– बिहार की राजनीति में नीतीश की अनिवार्यता।”

दीपक कुमार तिवारी।पटना/नई दिल्ली।

बिहार की राजनीति का केंद्रबिंदु बन चुके नीतीश कुमार ने बार-बार यह साबित किया है कि उनकी भूमिका सिर्फ ‘किंगमेकर’ तक सीमित नहीं, बल्कि खुद ‘किंग’ के रूप में भी अपरिहार्य है। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने नए साल की शुरुआत में अपने दरवाजे नीतीश के लिए खोलने की बात कहकर सियासी हलचल तेज कर दी है। हालांकि, लालू के इस प्रस्ताव को उनके बेटे तेजस्वी यादव ने सिरे से खारिज कर दिया है, जिससे आरजेडी के भीतर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।
नीतीश की राजनीतिक चतुराई का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जेडीयू, तीसरे नंबर की पार्टी होने के बावजूद, सत्ता में निर्णायक भूमिका निभा रही है। चाहे भाजपा हो या आरजेडी, दोनों को सत्ता के लिए नीतीश का साथ मजबूरन कबूलना पड़ा।


2010 में नीतीश ने आरजेडी को 22 विधायकों पर सीमित कर दिया। लेकिन 2015 में उन्हें साथ लेकर सत्ता में वापसी का मौका दिया।
नीतीश के साथ गठबंधन कर भाजपा ने सत्ता पाई, लेकिन हर बार नीतीश के निर्णय से उन्हें पीछे हटना पड़ा।
तेजस्वी यादव ने नीतीश को चुनौती देने की पूरी कोशिश की, लेकिन हर बार मात खानी पड़ी। विधानसभा चुनाव से लेकर फ्लोर टेस्ट तक, नीतीश की रणनीतियों ने साबित कर दिया कि वे बिहार की राजनीति के ‘अभियंता’ हैं।
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की अनिवार्यता को नकारना मुश्किल है। उनके सहयोगी और विरोधी, दोनों ही उनकी चालों के आगे खुद को कमजोर पाते हैं। सवाल यह है कि आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति किस करवट बैठेगी और क्या लालू का यह न्योता नीतीश को किसी नए सियासी समीकरण की ओर ले जाएगा?