-अब खेतों में नहीं दिखता बगुलों का झुंड,आधुनिकता ने बढ़ाई जंगली जीवों पर संकट
-किताबों में समा रहे,इतिहास में सिमट रहे कई जीव
-खेतों के प्लॉटों का टुकड़ों में बंटना भी है कारण
मुजफ्फरपुर/बन्दरा। दीपक कुमार तिवारी।
अब नए तरीकों से जहां क्षेत्र के चौर वाले इलाकों में खेतों में सिंचाई के साधन आधुनिक होते चले गए हैं। सुविधा बढ़ी हैं, लेकिन यह जंगली पशु-पक्षियों के लिए संकट भी लाया है।लिहाजा पशु-पक्षियों का तेजी से ह्रास हुए हैं। अब कई हिस्सों में खेतों में पटवन(सिंचाई) के दौरान या जलजमाव वाले इलाकों में बगुलों(पक्षी) का समूह नहीं दिखता। यदा-कदा मिल भी जाते हैं यहां ज्यादातर सामान्य चिड़ियां हीं होते हैं, लेकिन पटवन वाले खेतों में समूह में बगुलों का कलरव अब नहीं दिखता।
आधुनिकता ने छीनी पौराणिकता:
दरअसल प्राकृतिक बदलाव और बदलते सुविधाओं के बीच अब पौराणिकता खोती जा रही है। खेती के बढ़ते साधनों के बीच उपेक्षाएं आदि ऐसे दृश्य के घटने के कारण हैं।प्रगतिशील किसान सतीश कुमार द्विवेदी बताते हैं कि जब वे लोग बच्चे थे। तब उन्होंने खेतों में सिंचाई के दौरान बगुलों के समूह की चहलकदमी को करीब से देखा है। नूनफारा में मदन ठाकुर ने बताया कि उनके पूर्वजों बाबा एवं पिताजी के द्वारा जब खेती की जाती थी, तब खेतों में सिंचाई के दौरान उजले बगुलों का कलरव काफी मोहक लगता था। इतनी भीड़ होती थी कि उस बगुलों को हटाना मुश्किल होता था।किसान विमल सिंह बताते हैं कि इससे फायदा होती थी कि बगुले जहां पानी पीकर अपने प्यास बुझाते थे, वहीं खेतों में कीड़े मकरों को खाकर उनकी भूख भी मिटती थी। वहीं इस बहाने से बच्चों को जहां खेलने का माध्यम हो जाता था, वहीं किसानों को भी खेत पटाने के दौरान ऐसे दृश्य को देखकर मन हर्षित रहता था। उन्होंने देखा है कि बगुलों का समूह इतना होता था,कि उसे कई बार हटाना मुश्किल होता था। अब ऐसे दृश्य नहीं दिखते हैं। यदि कहीं बगुलों का समूह जल जमाव वाले इलाकों में या सिंचाई वाले खेतों में कहीं दिखता भी है तो यह अल्पसंख्यक में होते हैं।

खेत प्लॉटों का टुकड़ों में बंटना भी है कारण:
पूर्व सरपंच तबस्सुम आरा बताते हैं किसके कई कारण है। पहले जहां खेतों की प्लॉटिंग बड़ी होती थी। बड़े प्लॉट में सिंचाई करते हुए चिड़ियों के लिए खाने-पीने का माध्यम होता था। आपसी एकता भी दिखती थी, लेकिन अब भाइयों के विवाद में खेतों का बंटवारा शुरू हो गया। बड़े प्लॉट छोटे हो गए। बड़ी खेती-किसानी अब घटकर छोटे प्लाट में बंट गई,लिहाजा यह न सिर्फ मानव जीवन के लिए संकट की घड़ी है,बल्कि पशु-पक्षियों के लिए और ज्यादा खतरनाक है।
पहले खेतों के मेड़,कोनों आदि पर बिल(मांद) बनाकर चूहा, जंगली बिल्ली( बिलार ),सांप, बिच्छू, जंगली चीटियां आदि रहा करते थे, लेकिन अब खेतों में मेड़ नहीं दिखते। किसान खेतों में तो अब मेड़ छोड़ना भी नहीं चाहते। पहले प्रत्येक किसानों के पास इंकड़ी(इंकरबन्नी),खड़(खरौड़ी)केला(केरबन्नी) का खेत हुआ करता था। जिसमें जंगली जानवरों (सांप,गीदड़, जंगली सूअर,सनगोई, बन बिलार(जंगली नर बिल्ली) आदि जानवरों का बसेरा भी हुआ करता था, लेकिन अब ऐसे खेतों की कमी के साथ इन जानवरों पर भी खतरा उत्पन्न हो गया है।लिहाजा सभी अब किताबों में सिमटकर इतिहास बन रहे।

पूर्व प्रमुख दिनेश राय ने बताया कि अब प्रखंड या जिले के बॉर्डर क्षेत्र के सुदूर इलाकों में जहां जल जमाव आदि के कारण साल के कई महीने तक खेती किसानी में देरी होती है। ऐसे इलाकों में छोटे-छोटे टुकड़ों में ऐसे खेत और दृश्य दिख भी जाते हैं, लेकिन वैसे एरिया जिसे विकसित या डेवलप एरिया लोग कहते हैं।वैसे एरिया में ऐसे प्राकृतिक खेत या दृश्य का अभाव है। लोग आधुनिक विकास के भाग दौड़ में कई पौराणिक एवं पारंपरिक चीजों को पीछे छोड़ रहे हैं। आधुनिक खेती की बात कर रहे हैं, लेकिन जरूरी की चीज समाप्त हो रही है। ऐसे में घर- परिवार- समाज-क्षेत्र सभी कमजोर होता जा रहा है। पारंपरिक चीज अब इतिहास बन रही। ऐसी चीजों को हमलोग तो थोड़ा बहुत जानते भी हैं, लेकिन हमारी अगली पीढ़ी इसे इतिहास के पन्नों में ही देख-सुन-पढ़ सकेगी।












