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विद्या-मार्तण्ड डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : ज्ञान के अनुपम शिखर तक पहुंचे गुरु की गौरवशाली यात्रा

-विद्या-मार्तण्ड डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : ज्ञान के अनुपम शिखर तक पहुंचे गुरु की गौरवशाली यात्रा

आलेख: दीपक कुमार तिवारी।

भारत की महान ज्ञान परंपरा में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है। गुरु केवल वह नहीं जो किताबों का ज्ञान देता है, बल्कि वह है जो अज्ञान के अंधकार से निकालकर विद्यार्थी के भीतर ज्ञान, विवेक, संस्कार और आत्मविश्वास की ज्योति प्रज्वलित करता है। इसी महान परंपरा के एक उज्ज्वल नक्षत्र थे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, जिनका पूरा जीवन शिक्षा, दर्शन और ज्ञान के प्रति समर्पण की प्रेरक कहानी है। हर वर्ष 5 सितंबर को मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस उन्हीं महान शिक्षक और दार्शनिक को समर्पित है।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के तिरुत्तनी में हुआ था। सामान्य पारिवारिक और सीमित आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उनमें पढ़ने और सीखने की अद्भुत ललक थी। उन्होंने शिक्षा को अपनी जीवन-साधना बनाया और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया। आगे चलकर यही विषय उनकी पहचान बना और उन्होंने भारतीय दर्शन को न केवल देश में, बल्कि पूरी दुनिया में प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

राधाकृष्णन का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना या डिग्री हासिल करना नहीं है। शिक्षा मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करती है और उसे अपने भीतर झांकने, सत्य को समझने तथा समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पहचानने की क्षमता देती है। शिक्षक के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों को केवल विषय का ज्ञान नहीं दिया, बल्कि उन्हें स्वतंत्र चिंतन, तर्क और जिज्ञासा के लिए प्रेरित किया। उनके व्याख्यानों में विषय की गहराई के साथ जीवन की वास्तविकताओं की समझ भी दिखाई देती थी।

एक शिक्षक के रूप में उनकी प्रतिभा इतनी प्रभावशाली थी कि उन्होंने शिक्षा जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। विभिन्न प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में अध्यापन करते हुए उन्होंने भारतीय दर्शन और संस्कृति की समृद्ध परंपरा को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया। उनका लेखन और चिंतन भारत की आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत को विश्व के सामने रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बना।

ज्ञान के क्षेत्र में उनकी असाधारण प्रतिभा ने उन्हें शिक्षा जगत से आगे राष्ट्र के महत्वपूर्ण दायित्वों तक पहुंचाया। वे स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति बने और वर्ष 1962 में देश के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हुए। यह भारतीय लोकतंत्र और शिक्षा जगत दोनों के लिए गौरव का क्षण था। हालांकि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपनी पहचान को सबसे पहले एक शिक्षक के रूप में ही देखा।

डॉ. राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने के पीछे भी उनके व्यक्तित्व की यही विनम्रता और शिक्षक के प्रति सम्मान की भावना जुड़ी है। जब उनके विद्यार्थियों और प्रशंसकों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा व्यक्त की, तो उन्होंने व्यक्तिगत उत्सव के बजाय इस दिन को शिक्षकों के सम्मान के लिए समर्पित करने की इच्छा जताई। तभी से 5 सितंबर भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

आज शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों को शुभकामनाएं देने और सम्मानित करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह उस महान विचार को याद करने का दिन भी है कि किसी राष्ट्र का भविष्य उसकी कक्षाओं में तैयार होता है। शिक्षक की भूमिका केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं हो सकती। एक शिक्षक विद्यार्थी के विचारों को दिशा देता है, उसके भीतर आत्मविश्वास पैदा करता है और उसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने के योग्य बनाता है।

आज शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। डिजिटल तकनीक, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने ज्ञान तक पहुंच को पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। विद्यार्थी दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर कुछ ही क्षणों में जानकारी प्राप्त कर सकता है। लेकिन जानकारी और ज्ञान में अंतर होता है। सही और गलत की पहचान, विवेकपूर्ण निर्णय, मानवीय संवेदना, नैतिकता और चरित्र का निर्माण आज भी शिक्षक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। ऐसे समय में डॉ. राधाकृष्णन की शिक्षा-दृष्टि और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।

उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो मनुष्य को विनम्र बनाए, उसके भीतर विवेक पैदा करे और उसे समाज के प्रति जिम्मेदार बनाए। उन्होंने अपने जीवन से साबित किया कि एक शिक्षक की शक्ति केवल कक्षा की चारदीवारी तक सीमित नहीं होती। एक सच्चा गुरु अपने विद्यार्थियों के माध्यम से आने वाली कई पीढ़ियों को प्रभावित कर सकता है।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की यात्रा एक साधारण परिवेश से ज्ञान के अनुपम शिखर तक पहुंचने की यात्रा है। उन्होंने शिक्षक की गरिमा को नई ऊंचाई दी और यह साबित किया कि ज्ञान के प्रति समर्पण व्यक्ति को समाज और राष्ट्र के सर्वोच्च सम्मान तक पहुंचा सकता है। राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने के बावजूद उनकी सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रपति नहीं, बल्कि शिक्षक की रही।

आज जब हम शिक्षक दिवस मना रहे हैं, तब आवश्यकता केवल अपने गुरुओं को शुभकामनाएं देने की नहीं, बल्कि उनकी शिक्षाओं के महत्व को समझने की भी है। हमें यह विचार करना होगा कि हमारी शिक्षा विद्यार्थियों को केवल सफल बना रही है या उन्हें अच्छा इंसान भी बना रही है। क्योंकि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल जीवनयापन का साधन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाना है।

डॉ. राधाकृष्णन का जीवन हमें प्रेरणा देता है कि ज्ञान की खोज कभी समाप्त नहीं होनी चाहिए। गुरु वह दीपक है जो स्वयं जलकर दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाता है। शिक्षक दिवस पर ऐसे महान शिक्षक को स्मरण करना वास्तव में ज्ञान, गुरु-परंपरा और शिक्षा के उस आदर्श को नमन करना है, जो आने वाली पीढ़ियों को बेहतर समाज और बेहतर राष्ट्र के निर्माण की राह दिखाता है।

आइए, इस शिक्षक दिवस पर अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ यह संकल्प भी लें कि शिक्षा को केवल अंक और डिग्री तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि उसे ज्ञान, विवेक, संस्कार और मानवता से जोड़ेंगे। यही विद्या-मार्तण्ड डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।