-लल्लनटाप के दौर में गाँव कहाँ गइल?
पकुआ खा के दादा जियले,
मड़ुआ खा के बाप,
बेटवा खाला बर्गर-पिज्जा,
बने बड़ा लल्लनटाप!
लँगोटी पहिर के दादा जियले,
धोती पहिर के बाप,
फाटल जिन्स में बेटवा घूमे,
बने बड़ा लल्लनटाप!
वेद-पुराण दादा पढ़ले,
रामायण पढ़ले बाप,
बेटवा मोबाइल में दिनभर,
देखे जाने का-क्या ऐप!
दादा के बोली मीठी लागे,
बाप के बात में ज्ञान,
बेटवा दू शब्द अंग्रेजी बोले,
समझे खुद के महान!
दूध-दही अब भावे नइखे,
पिज्जा-बर्गर चाहीं,
घर के चूल्हा सूना पड़ल बा,
बाहर के स्वादे भाहीं!
घूँघट अब घर से दूर भइल,
साड़ी लागे भारी,
नयकी बहुरिया जिन्स चढ़ा के,
घूमे बीच बजार!
माई-बाप के मान घटल बा,
दुनिया में अजब रिवाज,
जिनका गोदी में पलल बचवा,
उहे बने आज बोझ-राज!
भाई-भाई में प्यार घटल बा,
हिस्सा बनल हथियार,
सांझ-बिहाने लड़ाई होला,
कैसन बदलल परिवार!
सास-पतोह के पावन नाता,
कहाँ गइल ऊ छोह?
बात-बात पर रण छिड़ जाला,
सूख गइल मन के मोह!

बरगद-पाकड़ बूढ़ हो गइले,
पीपर पड़ल बेहाल,
चौपालन के जगह अब देखीं,
मोबाइल के जाल!
गाँव के गलियन में ना गूँजे,
पहिले जइसन गीत,
चौपाल सूना, मन अकेला,
कहाँ गइल ऊ प्रीत?
धरम-करम आ रीत-रिवाज के,
कइसे राखीं शान?
नाम के आगे बड़ा-बड़ा शब्द,
भीतर खाली ज्ञान!
समय बदलल, बदलल दुनिया,
बदलल खान-पान,
बदलाव बुरा ना हऽ साथी,
बचावल जरूरी संस्कार!
आधुनिक बन, आगे बढ़ तू,
ज्ञान के कर सम्मान,
माई-बाप के सेवा करिहऽ,
यही हऽ सच्चा महान!
मोबाइल रख, मगर मन मत बेच,
पैसा रख, ईमान बचा,
नई राह पर कदम बढ़ावऽ,
जड़ से अपना नाता बचा!
दादा के अनुभव, बाप के मेहनत,
माई के ममता साथ,
संस्कार अगर बचल रही,
रोशन होई हर बात!
नया जमाना अपनाईं जरूर,
पर पुरनका जड़ मत काटऽ,
दुनिया चाहे कहे लल्लनटाप,
तू इंसानियत से नाता मत तोड़ऽ!
— दीपक कुमार तिवारी












