-गोदना: परमानेंट टैटू, लोकगाथा और लिलिया की परंपरा
श्याम किशोर ✍️
ग्रामीण जीवन की सांस्कृतिक विरासत में गोदना केवल शरीर पर बना एक निशान नहीं, बल्कि प्रेम, आस्था, सौंदर्य और स्मृतियों की अमिट पहचान रहा है। बुजुर्ग महिलाओं की गर्दन, बांहों और पैरों तथा पुरुषों की बांहों पर बने गोदना के निशान आज भी बीते दौर की जीवंत यादें संजोए हुए हैं।
गोदना गोदने वाली महिलाओं को स्थानीय परंपरा में गोदनहारिन या गोदपारनी कहा जाता था। उनकी टोलियां गांव-गांव घूमती थीं और सुई की मदद से त्वचा पर स्थायी निशान बनाती थीं। इस प्रक्रिया में दर्द होना स्वाभाविक था, लेकिन गोदनहारिन अपने लोकगीतों, लिलिया, प्रेम-मुहब्बत, मनुहार और हंसी-मजाक से उस पीड़ा को कम करने का प्रयास करती थीं। इस तरह गोदना गुदवाना केवल शृंगार की प्रक्रिया नहीं, बल्कि ग्रामीण लोकसंस्कृति का एक आत्मीय आयोजन बन जाता था।
आस्था, प्रेम और सामाजिक विश्वास की पहचान:
पुराने समय में गरीब परिवारों के लिए सोने-चांदी के आभूषण खरीदना आसान नहीं था। ऐसे में गोदना शरीर का स्थायी शृंगार माना जाता था। कई स्थानों पर गोदनहारिन को नकद रुपये या अनाज के साथ नेग देने की परंपरा भी थी। कुछ समुदायों में गोदना गुदवाने के साथ विशेष सामाजिक रीति-रिवाज जुड़े हुए थे।

गोदना से जुड़ी एक लोकमान्यता यह भी थी कि शरीर पर गोदना न होने पर बेटी को मृत्यु के बाद अपनी मां से मिलने में कठिनाई होगी। यह कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं, बल्कि मां-बेटी के अटूट प्रेम और मृत्यु के बाद भी संबंध कायम रहने की लोककल्पना को व्यक्त करने वाली धारणा थी। वहीं, कुछ प्रेमी जोड़े अपने प्रिय की याद या प्रेम के प्रतीक के रूप में भी गोदना गुदवाते थे। इस तरह गोदना शरीर पर बने निशान से आगे बढ़कर भावनाओं और रिश्तों की अभिव्यक्ति बन जाता था।
लोकज्ञान, पारंपरिक मान्यताएं और बदलता समय:
ग्रामीण समाज में गोदना से जुड़ी अनेक पारंपरिक मान्यताएं प्रचलित थीं। कुछ स्थानों पर विशेष चिह्नों और वनस्पतियों से तैयार रंगों को स्वास्थ्य तथा सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता था। हालांकि, गोदना से बीमारियों का उपचार होने या उसके विशेष औषधीय लाभ मिलने के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
पहले गोदना बनाने में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की स्वच्छता और संक्रमण से बचाव के साधन सीमित थे। एक ही सुई या दूषित उपकरणों का इस्तेमाल करने से हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी और एचआईवी जैसे संक्रमण फैलने का जोखिम हो सकता है। आधुनिक जीवनशैली, स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और बदलती सामाजिक पसंद के कारण अनेक क्षेत्रों में यह परंपरा धीरे-धीरे सिमटती चली गई।
आज पारंपरिक गोदना की जगह आधुनिक टैटू ने ले ली है। इसके बावजूद पुरानी पीढ़ी के शरीर पर अंकित गोदना के निशान हमारे लोकइतिहास के मौन दस्तावेज बने हुए हैं। इनमें एक ऐसे समय की झलक मिलती है, जब लोकगीत, परंपराएं और सामुदायिक जीवन ग्रामीण समाज की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा थे।
लोकविरासत को समझें और संजोएं:
गोदना की परंपरा को केवल अंधविश्वास या पुराने फैशन के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसके भीतर लोकगीतों की मिठास, ग्रामीण महिलाओं की कलात्मक कुशलता, प्रेम की अभिव्यक्ति और सामुदायिक जीवन की आत्मीयता छिपी है। जरूरत है कि इस लोककला का इतिहास, इससे जुड़ी लिलिया और लोकगाथाएं तथा बुजुर्गों की स्मृतियां संजोकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाई जाएं।
लोकपरंपराएं हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं, जबकि वैज्ञानिक जागरूकता हमारे सुरक्षित भविष्य का आधार है। अपनी विरासत को सहेजते हुए स्वास्थ्य और स्वच्छता के आधुनिक मानकों को अपनाना ही इस परंपरा के प्रति सच्चा सम्मान होगा।












