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गठबंधनों में झोल ही झोल : बिहार चुनाव 2025 का महागठबंधन बनाम एनडीए समीकरण

-गठबंधनों में झोल ही झोल : बिहार चुनाव 2025 का महागठबंधन बनाम एनडीए समीकरण

अनूप नारायण सिंह।पटना।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का बिगुल बजने ही वाला है। अक्टूबर के पहले हफ्ते में तारीखों का ऐलान होगा और उसके बाद सियासी सरगर्मी चरम पर होगी। इस बार का चुनाव केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करेगा। यही वजह है कि एनडीए और महागठबंधन दोनों अपनी-अपनी गोटियां बिछाने में जुटे हैं।

भाजपा की रणनीतिक चाल:

भाजपा ने धर्मेंद्र प्रधान को बिहार चुनाव का प्रभारी बनाकर बड़ा दांव खेला है। उनकी छवि संगठन को मजबूत करने वाले रणनीतिकार की रही है। यूपी और ओडिशा में भाजपा की जीत का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। अब भाजपा उम्मीद कर रही है कि बिहार में भी उनका अनुभव कारगर होगा। साथ ही केशव प्रसाद मौर्य और सीआर पाटिल को सह-प्रभारी बनाकर पार्टी ने जातीय और क्षेत्रीय समीकरण साधने की कोशिश की है।

नीतीश कुमार की भूमिका:

जदयू अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक भूमिका इस चुनाव में बेहद अहम है। उनकी छवि “पलटीमार” नेता की भी रही है, जिसे विपक्ष मुद्दा बनाएगा। लेकिन एनडीए उनके अनुभव और “स्थिर सरकार” की छवि को आगे रखकर वोटरों को साधना चाहेगा।

महागठबंधन की अंदरूनी खींचतान:

राजद, कांग्रेस, वाम दल और वीआईपी मिलकर महागठबंधन बना रहे हैं। हालांकि, सीट बंटवारे और नेतृत्व को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। तेजस्वी यादव को सीएम चेहरा मानने पर राजद और कांग्रेस के बीच सहमति नहीं बन पाई है। कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह इस बार “छोटे भाई” की भूमिका में नहीं रहेगी और चुनाव अभियान को खुद लीड करेगी। इससे तेजस्वी की दावेदारी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सीटों की सौदेबाजी का पेच:

एनडीए और महागठबंधन दोनों में छोटे दल अपने-अपने हिस्से की सीटों को लेकर दबाव बना रहे हैं।

एनडीए में: लोजपा (आर) 40 से ज्यादा सीटें मांग रही है, जबकि जदयू-भाजपा उन्हें लगभग आधी देने के मूड में हैं। हम (HAM) ने न्यूनतम 15 सीटों की मांग रखी है। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी भी 8-10 सीटों पर नजर गड़ाए है।

महागठबंधन में: कांग्रेस का रुख सख्त है। वह 30 से ज्यादा सीटें चाहती है और इस बार खुद को “निर्णायक” की भूमिका में पेश कर रही है। वहीं, राजद चाहती है कि महागठबंधन का चेहरा तेजस्वी ही हों।

चुनावी मुद्दे:

एनडीए का फोकस: नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, केंद्र की योजनाएं और “स्थिर सरकार” का वादा।

महागठबंधन का हमला: बेरोजगारी, महंगाई, जातीय समीकरण और नीतीश कुमार की पलटीमार छवि।

बिहार चुनाव 2025 में गठबंधन की मजबूरी और सीट बंटवारे की खींचतान दोनों तरफ है। एनडीए हो या महागठबंधन, “गठबंधन धर्म” को निभाना आसान नहीं होगा। चिराग पासवान और मांझी जैसे छोटे दल जहां अपनी ताकत दिखाकर सौदेबाजी कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस भी राजद को चुनौती देकर खुद को मजबूत करना चाहती है।

आने वाले हफ्तों में जब सीटों का बंटवारा होगा और उम्मीदवारों की सूची सामने आएगी, तभी साफ होगा कि कौन सा गठबंधन एकजुट होकर मैदान में उतरता है और किसके भीतर की खींचतान ही उसे हार की ओर धकेल देती है। फिलहाल तस्वीर यही कहती है—
“बिहार की सियासत में इस बार गठबंधनों में झोल ही झोल है।”