Advertisement

एक ऐसी सीरियल जिसके प्रसारण के दौरान पूरा हिंदुस्तान रुका रहता था

🖼 एक ऐसी सीरियल जिसके प्रसारण के दौरान पूरा हिंदुस्तान रुका रहता था.
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
1987 का साल भारतीय टेलीविजन के इतिहास में बड़ी अहमियत रखता है. इसी साल टीवी पर ‘रामायण सीरियल’ की शुरुआत हुई थी जिसके प्रसारण के दौरान पूरा हिंदुस्तान रुका रहता था. आज की पीढ़ी इस ‘लोकप्रियता’ का अंदाजा शायद ना लगा पाए.इस धारावाहिक के प्रसारण के दौरान ऐसा लगता था मानो पूरा भारत ठहर गया हो। लोग अपना काम-धन्धा छोड़कर टीवी से चिपक जाते थे।बाज़ार बन्द हो जाते थे, बसें रुक जाती थीं, कई बार तो ट्रेन भी रुक जाती थी।उस समय गाँवों में किसी-किसी के पास ही टीवी होता था। जिसके पास टीवी होता था, उसके यहाँ रामायण देखने के लिए पूरा गाँव उमड़ पड़ता था। रामायण का कोई एपीसोड छूट न जाए, इसके लिए एक दिन पूर्व ही योजना बना ली जाती थी। कई लोगों ने अपनी शादी की तारीख और समय तक बदल दिए ताकि रामायण का एक भी एपिसोड उनसे न छूटे.लखनऊ के एक अस्पताल में मरीजों ने इस बात की शिकायत की थी कि डॉक्टर और नर्स ‘रामायण’ शुरू होते ही उन्हें छोड़कर सीरियल देखने चले जाते.थे.राजनीतिक दलों ने भी उस वक्त रैली निकालना बंद कर दिया था. उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री वीरबहादुर सिंह इस धारावाहिक को देखने के दौरान न तो किसी से मिलते थे, न फोन ही उठाते थे.इससे रामायण की लोकप्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है.’इण्डिया टुडे’ ने दर्शकों के इस उत्साह को ‘रामायण फीवर’ का नाम दिया था.


इसके अलावा भी इसकी लोकप्रियता को लेकर इंटरनेट पर अनेकानेक घटनाएं बिखरी पड़ी हैं:चंडीगढ़ में एक दुल्हन शादी के मंडप में नहीं पहुंची. बाराती लंबे समय तक इंतजार करते रहे. जब इंतजार की हद हो गई तो कुछ लोगों ने पता करने की कोशिश की कि आखिर दुल्हन है कहां, पता चला कि दुल्हन ने कह रखा था कि वो उस रोज के रामायण का ‘टेलीकास्ट’ देखकर ही मंडप में जाएगी.
ऐसे ही जयपुर के बिड़ला मंदिर में चालीस हज़ार लोग सिर्फ़ इसलिए जमा हो गए थे क्योंकि वहां रामायण सीरियल में राम का किरदार निभा रहे अरुण गोविल और सीता का किरदार निभा रही दीपिका आने वाले थे. चालीस हजार की भीड़ में कुछ उच्च श्रेणी के नेता भी शामिल थे.
यही नहीं,भारत के के शहरों और गांवों में रामायण के टेलीकास्ट के समय लोग अगरबत्ती जलाकर बैठा करते थे. चप्पलें कमरे के बाहर उतार दी जाती थीं.यकीन ना कर पाने वाली ये बातें सच हैं.यही नही इस धारावाहिक के कलाकार जीते-जी किंवदन्ति बन गए और ईश्वर के समान पूजे जाने लगे.प्रसारण शुरू होते ही लोग अपने टी.वी.पर माला डाल देते थे.लोगों का विश्वास था कि ईश्वर साक्षात उनके घर आ गए हैं. विशेषकर राम,सीता और हनुमान की भूमिका निभानेवाले क्रमशः श्री अरुण गोविल, सुश्री दीपिका चिखलिया और श्री दारा सिंह ईश्वर के समान पूजे जाने लगे. ये संभव है कि इसमें से कुछ किस्से मनगढ़ंत हों लेकिन इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि रामायण देखने वाला हर एक दर्शक उसे सिर्फ एक सीरियल मानकर नहीं देखा करता था.
इस सीरियल के बीच बीच में रवींद्र जैन का शानदार संगीत और गायकी भी उतनी ही लाजवाब थी. शायद यही वजह है कि रामायण पौराणिक धारावाहिकों में दुनिया भर में सबसे ज्यादा देखा जाने वाला सीरियल बन गया था.ये रिकॉर्ड बाकयदा लिम्का बुक में दर्ज है.
78 कड़ियों के इस धारावाहिक का मूल प्रसारण 25 जनवरी, 1987 से 31 जुलाई, 1988 तक रविवार के दिन दूरदर्शन पर किया जाता था। नब्बे के दशक में, जब भारत में टीवी का प्रसार बहुत नहीं हुआ था, उस समय हर सप्ताह इस धारावाहिक को लगभग 10 करोड़ लोग देखते थे.
‘रामायण’ के ज़रिये टीवी की दुनिया में एक क्रांति लाने और इस ऐतिहासिक धारावाहिक के ज़रिये रामायण को घर घर पहुंचने का काम करने वाले थे- रामानंद सागर जिन्हें आधुनिक युग के ‘वाल्मिकी’ और ‘तुलसीदास’ की संज्ञा भी दी जाती है.रामानन्द सागर की जीवन यात्रा भी किसी धारावाहिक से काम नहीं.उनका जन्म 29 दिसम्बर 1917 को पाकिस्तान के लाहौर में हुआ था.बचपन का नाम था चंद्रमौली चोपड़ा.मां चल बसीं तो पिता ने दूसरी शादी कर ली.इस भावनात्मक-संघर्ष के अलावा और भी बड़े संघर्ष उनके बचपन में थे.पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे.रामानंद सागर ने दिन में ‘चपरासी’ से लेकर ‘ट्रक-क्लीनर’ तक का काम किया और रात को पढ़ाई. इस मेहनत ने रंग दिखाया. वो ‘संस्कृत’ और ‘पर्शियन’ में ‘गोल्ड-मेडलिस्ट’ रहे.


आज़ादी के बाद रामानंद सागर हिंदुस्तान आ गए.उन्होंने मुंबई का रुख किया.इस दौरान उन्होंने बंटवारे के दर्द पर एक किताब भी लिखी. जिसका शीर्षक था “और इंसान मर गया”.खैर,मुंबई पहुंचने के बाद वहां उन्हें पृथ्वीराज कपूर के साथ काम करने का मौका मिला.ये रामानंद सागर की क़ाबिलियत ही थी कि अगले दस साल में उनका अपना प्रोडक्शन-हाउस बनकर तैयार था.
इससे पहले फिल्म इंडस्ट्री के शोमैन राज कपूर के पैर जमाने में भी रामानंद सागर का बड़ा योगदान रहा. राज कपूर के निर्देशन में जो शुरुआती फिल्में सुपरहिट हुईं उसमें फिल्म ‘बरसात’ का नाम आता है.बरसात की कहानी रामानंद सागर की ही लिखी हुई थी. इसी फिल्म की कामयाबी के बाद ही राज कपूर ने आर.के. स्टूडियो खरीद लिया था. बतौर संगीतकार ये शंकर जयकिशन की पहली फिल्म थी. जिसके गानों ने धमाल मचा दिया था.
अगले करीब 35 साल तक रामानंद सागर फिल्मी-दुनिया में सक्रिय रहे.उन्होंने फिल्में लिखीं, डायलॉग्स लिखे,डायरेक्शन किया और फिल्में प्रोड्यूस भी की.करीब दो दर्जन फिल्मों में किसी ना किसी तरह उनका योगदान रहा.इसमें आरज़ु, आंखें और पैग़ाम जैसी फ़िल्में काफ़ी चलीं.1960 में उन्हें फिल्म ‘पैगाम’ की कहानी के लिए पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला.फिल्म पैगाम में दिलीप कुमार,वैजयंती माला ने अभिनय किया था.इसके बाद फिल्म ‘आरजू ‘में उन्होंने साधना,राजेंद्र कुमार और फिरोज खान जैसे कलाकारों को डायरेक्ट किया.इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर नॉमिनेशन मिला.
अपने दूसरे फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए उन्हें 1969 में रिलीज फिल्म ‘आंखे’ तक इंतजार करना पड़ा.माला सिन्हा और धर्मेंद्र को लेकर बनाई गई इस फिल्म के लिए रामानंद सागर को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का अवॉर्ड मिला.
1985 में जब उन्होंने फिल्मी दुनिया से अलग होकर ‘रामायण’ सीरियल बनाया तो फिर वो वापस फिल्मी दुनिया में नहीं जा पाए.रामायण की कामयाबी ने उन्हें छोटे पर्दे पर लगातार व्यस्त रहा.रामायण के बाद उन्होंने ‘विक्रम और बेताल’, ‘लवकुश’, ‘कृष्णा’, ‘अलिफ लैला’ और ‘साईं बाबा’ जैसे सीरियल भी बनाए. अपनी जिंदगी के आखिरी समय में भी वो ‘एक्टिव’ रहे और टेलीविजन सीरियल निर्माण में लगे रहे. ‘साईं बाबा’ उनका आखिरी सीरियल साबित हुआ.12 दिसम्बर 2005 में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा. रामानंद सागर को भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ से भी सम्मानित किया. लेकिन उनका असली पुरस्कार वो प्यार है जो उन्हें करोड़ों दर्शकों ने रामायण के लिए दिया.
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
(नोट:लेेेखक अनूप नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार तथा फिल्म सेंसर बोर्ड कोलकाता के सदस्य हैं।)