-आक्रामक भाजपा, असमंजस में महागठबंधन और जन सुराज की चुनौती
-बिहार की चुनावी राजनीति में नए समीकरण
पटना | दीपक कुमार तिवारी।
बिहार की राजनीति एक बार फिर करवट ले रही है। गठबंधन बदल रहे हैं, मतदाताओं की प्राथमिकताएं नई दिशा ले रही हैं और प्रशांत किशोर जैसे नए खिलाड़ी विकल्प बनकर उभर रहे हैं। इन सबके केंद्र में है भाजपा की आक्रामक चुनावी रणनीति, जो पारंपरिक उच्च जातियों के साथ-साथ ईबीसी मतदाताओं को भी साधने में जुटी है—जो अब तक जेडीयू का मजबूत आधार माने जाते थे।
वहीं एनडीए से पशुपति पारस का अलग होना और महागठबंधन की ओर संभावित झुकाव राजनीतिक धाराओं में नई सरगर्मी ला रहा है। इसी बीच वीआईपी के मुकेश सहनी जैसे नेता भी अपने रुख को लेकर अनिश्चितता बनाए हुए हैं। भारत-पाक तनाव और युद्ध जैसे हालात भी मतदाताओं की मनोदशा पर असर डाल सकते हैं, जिससे अंतिम समय में वोटों का मिजाज बदलना तय माना जा रहा है।
भाजपा जहां हिंदुत्व, बुनियादी ढांचे और वंशवाद-विरोध के एजेंडे को प्रमुखता दे रही है, वहीं महागठबंधन सामाजिक न्याय, महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता और श्रमिक-भूमि सुधार जैसे विषयों पर जोर दे रहा है। हालांकि, रणनीतिक असंगति, नेतृत्व की स्पष्टता की कमी और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण महागठबंधन मतदाताओं के बीच प्रभाव छोड़ने में कमजोर नजर आ रहा है।

कांग्रेस अब भी गठबंधन की बैसाखियों पर टिकी है, जबकि वामपंथ की वर्ग आधारित राजनीति बिहार जैसे जातिप्रधान राज्य में सीमित असर छोड़ पा रही है। उधर, जन सुराज ने शासन में पारदर्शिता, गैर-वंशवादी नेतृत्व और जनभागीदारी को मुद्दा बनाया है, जिससे युवाओं और पहली बार वोट कर रहे मतदाताओं में हलचल है। मगर जातीय आधार और संगठनात्मक नेटवर्क की कमी इसे सीमित प्रभाव वाला ही बनाए हुए है।
भाजपा-जेडीयू की जोड़ी, तमाम वैचारिक मतभेदों के बावजूद, एक स्थिर और संगठित गठबंधन के रूप में खुद को प्रस्तुत कर रही है। जातिगत जनगणना के मुद्दे को लेकर भी एनडीए ने बढ़त बनाई है।
बिहार की राजनीति में यह बदलाव यह भी दर्शाता है कि अब मतदाता जाति और संरक्षण से ऊपर उठकर वैचारिक सुसंगतता, स्थायित्व और जवाबदेही को प्राथमिकता देने लगे हैं। यह एक “संकर तर्कसंगतता” की शुरुआत हो सकती है, जो बिहार की पारंपरिक चुनावी प्रवृत्तियों को चुनौती देती है।












