हां तुम भी तो पुरुष ही हो…
तुम कहां सह पाते स्त्री की वाचालता….
देह के भूगोल का अपनी परिभाषाओं से
अध्ययन करके तुम परे हट गए…
तुम कहां समझ सकते हो
प्रकृति के असंतुलन का गणित…
प्रकृति की वस्तुएं उपभोग करके
त्यागने के लिए ही बनी होती हैं।
हवा,पानी,मिट्टी, आग की तरह
प्रेम भी तो निशुल्क होता है….
देह का ये पंचतत्व प्रेम को विलग कर दे तो
शेष बचता भी क्या है…
वेदी की अग्नि से चिता की अग्नि तक का
ये मार्ग जितना सहज लगता है उतना ही दुष्कर होता है..
परन्तु उस अंतिम संस्कार की प्रणीति में
एक स्त्री मुक्त होती है
कई कल्पों की पाप से निर्मित अवधारणाओं से…
वो मुक्त होती है अपनी ऊसरता से भी
जहां कोई भी बीज अंकुरित नही हो पाने का दंश
उसे मृत्युपर्यंत चुभन देता रहा…
वो मुक्त होती है संसार की सभी त्रुटियों का दोष
उसके सिर पर मढ दिए जाने से…
एक स्त्री… कितनी आकांक्षी होती है… मुक्त हो जाने के लिए….।। #अनूप
















