Advertisement

मक्के के छिलकों से बनाया प्लास्टिक का सस्ता और सुरक्षित विकल्प

-मक्के के छिलकों से बनाया प्लास्टिक का सस्ता और सुरक्षित विकल्प

-मुजफ्फरपुर के युवा इंजीनियर ने किया कमाल

मुजफ्फरपुर। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मनियारी क्षेत्र के मुरादपुर गांव के युवा इंजीनियर मोहम्मद नाज ओजैर ने पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी तकनीक के क्षेत्र में एक अनोखी मिसाल पेश की है। उन्होंने मक्के के छिलकों (कॉर्न हस्क) से ऐसे बायोडिग्रेडेबल उत्पाद तैयार किए हैं, जो सिंगल यूज प्लास्टिक का सस्ता, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प बनकर सामने आए हैं।
हैदराबाद की जवाहर लाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से एमटेक की पढ़ाई पूरी करने वाले नाज ओजैर के पास कई प्रतिष्ठित कंपनियों में नौकरी के आकर्षक प्रस्ताव थे, लेकिन उन्होंने बेहतर करियर का अवसर छोड़कर पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने का फैसला किया। करीब पांच वर्षों तक लगातार शोध और प्रयोग के बाद उन्होंने मक्के के छिलकों से उपयोगी उत्पाद बनाने की तकनीक विकसित की।
नाज ओजैर ने बताया कि करीब सात वर्ष पहले उनके कम उम्र के भतीजे की कैंसर से मौत हो गई थी। इस घटना ने उन्हें खाद्य पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के दुष्प्रभावों पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर प्लास्टिक का सुरक्षित विकल्प खोजने की दिशा में काम शुरू किया।
उन्होंने बताया कि मक्के की फसल से दाना निकालने के बाद किसान आमतौर पर छिलकों को बेकार समझकर फेंक देते हैं या खेतों में जला देते हैं। उन्होंने इसी कृषि अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदलते हुए चॉकलेट रैपर, डिस्पोजेबल कप, प्लेट, कटोरी, बैनर और कैरी बैग जैसे कई उत्पाद तैयार किए हैं।


नाज मक्के के छिलकों को विशेष प्रक्रिया से काटकर प्राकृतिक लेई की मदद से जोड़ते हैं और डाई मशीन से उन्हें मनचाहा आकार देते हैं। एक प्लेट बनाने में पांच से छह छिलके लगते हैं और इसकी लागत मात्र 50 पैसे आती है। यह उत्पाद पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल होने के साथ वाटरप्रूफ भी है।
उनके इस नवाचार को फरवरी 2024 में सरकारी पेटेंट भी मिल चुका है। उनकी इस उपलब्धि से प्रभावित होकर भारतीय रेलवे ने उनके स्टार्टअप को 30 लाख रुपये का बड़ा ऑर्डर दिया है, जिससे उनके उत्पादों की उपयोगिता और गुणवत्ता को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।
मोहम्मद नाज ओजैर केवल उत्पाद निर्माण तक ही सीमित नहीं हैं। वे दो दर्जन से अधिक स्कूलों में जाकर एक हजार से ज्यादा बच्चों को मक्के के छिलकों से तिरंगा और अन्य उपयोगी वस्तुएं बनाने का प्रशिक्षण दे चुके हैं। इसके माध्यम से वे नई पीढ़ी को प्लास्टिक के दुष्प्रभावों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक कर रहे हैं।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वरिष्ठ मक्का वैज्ञानिक डॉ. मृत्युंजय ने भी नाज के इस नवाचार की सराहना करते हुए कहा कि मक्के का छिलका प्लास्टिक का सबसे सस्ता और बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। नाज की इस पहल से अब बिहार के किसानों को पहले बेकार समझे जाने वाले मक्के के छिलकों का भी आर्थिक मूल्य मिलने लगा है। उनका यह नवाचार पर्यावरण संरक्षण, किसानों की आय बढ़ाने और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है।