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बिहार में कांग्रेस की चुनौती: प्रभारी बदला, लेकिन संगठन कब बदलेगा?

-बिहार में कांग्रेस की चुनौती: प्रभारी बदला, लेकिन संगठन कब बदलेगा?

-बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने बदला प्रभारी
-आठ साल से प्रदेश कमेटी नहीं, क्या पार्टी सिर्फ दिखावा कर रही है?
-नए प्रभारी कृष्णा अल्लावरु के सामने संगठन मजबूत करने और राजद से तालमेल बिठाने की बड़ी चुनौती

दीपक कुमार तिवारी । नई दिल्ली/पटना |

बिहार में अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन कांग्रेस अभी भी संगठन को मजबूत करने की चुनौती से जूझ रही है। पार्टी ने बिहार का नया प्रभारी कृष्णा अल्लावरु को बनाया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ प्रभारी बदलने से कांग्रेस की हालत सुधरेगी?

आठ साल से संगठन अधूरा, चुनाव की तैयारी कैसे?

बिहार में 2017 से प्रदेश कमेटी का गठन नहीं हो पाया है। मदन मोहन झा के कार्यकाल में कमेटी नहीं बनी, और वर्तमान अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह भी दिसंबर 2022 में नियुक्त होने के बाद अब तक नई टीम नहीं बना पाए। 2023 और 2024 बीत चुका है, अब 2025 का फरवरी आ गया, लेकिन प्रदेश कमेटी का गठन नहीं हुआ।

ऐसे में बड़ा सवाल उठता है—क्या कांग्रेस वाकई बिहार में चुनाव लड़ने के लिए तैयार है, या फिर सिर्फ दिखावा कर रही है?

नए प्रभारी की राह आसान नहीं:

दिल्ली में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद कांग्रेस ने कई राज्यों में अपने प्रभारी बदले हैं। बिहार में मोहन प्रकाश की जगह कृष्णा अल्लावरु को नया प्रभारी बनाया गया है।

कृष्णा अल्लावरु राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं और इससे पहले युवा कांग्रेस के प्रभारी रह चुके हैं। लेकिन बिहार में उनका सामना लालू यादव और तेजस्वी यादव जैसे अनुभवी नेताओं से होगा।

राजद किसी भी हाल में कांग्रेस को 70 सीट देने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस और राजद के बीच खींचतान बढ़ सकती है। कृष्णा अल्लावरु को न केवल संगठन को मजबूत करना होगा, बल्कि महागठबंधन में सीट शेयरिंग को भी साधना होगा।

बिहार में कांग्रेस की गिरती साख:

कांग्रेस बिहार में पिछले कई सालों से अपनी खोई हुई जमीन की तलाश में है, लेकिन अब तक उसे कोई सफलता नहीं मिली।

2015 विधानसभा चुनाव: कांग्रेस ने 27 सीटें जीती थीं।

2020 विधानसभा चुनाव: पार्टी सिर्फ 19 सीटों पर सिमट गई।

243 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस 70 सीटों की मांग कर रही है, लेकिन राजद इसे देने के मूड में नहीं दिख रहा।

नेता भी हताश, कार्यकर्ता भी निराश:

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा—
“बिहार में कांग्रेस को पुरानी पटरी पर लाने के लिए बड़े परिवर्तन की जरूरत है। केवल प्रभारी बदलने से कुछ नहीं होगा। कार्यकर्ता हताश हैं, संगठन अधूरा है। ऐसे में कैसे चुनावी मैदान में उतरेंगे?”

क्या कांग्रेस में बदलाव होगा?

बिहार कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या संगठनात्मक सुस्ती है। प्रदेश अध्यक्ष आते-जाते रहते हैं, लेकिन संगठन में बदलाव नहीं होता। अगर पार्टी को बिहार में फिर से खड़ा होना है, तो उसे सबसे पहले अपनी प्रदेश कमेटी का गठन करना होगा।

अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या कृष्णा अल्लावरु कांग्रेस को पटरी पर ला पाएंगे, या फिर यह सिर्फ एक दिखावटी बदलाव साबित होगा?

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