दीपक कुमार तिवारी।पटना/दरभंगा।
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-कमला और जीवछ को फिर से पुनर्जीवित किया जाए: नदी सत्याग्रह में लोगों का आह्वान
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– 1987 से पहले दरभंगा कमला नदी में डॉल्फिन (सूंस) अठखेलियाँ करती थीं
– नदी किनारे नदी पर संवाद’ का हुआ आयोजन
– उपवास तथा 40 किमी की सूखी नदियों की पदयात्रा पहले हो चुकी है
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वैश्विक लोकतंत्र और विश्व शान्ति की संस्था वर्ल्ड नेचुरल डेमोक्रेसी (डब्ल्यूएनडी) के तत्वावधान में नदी सत्याग्रह के तीसरे चरण ‘नदी किनारे नदी पर संवाद’ का आयोजन दुर्गा मन्दिर गौंसाघाट में आयोजित किया गया। प्रथम चरण में उपवास तथा द्वितीय चरण में बाग़मती एवं कमला नदी की 40 किमी की लम्बी पदयात्रा आयोजित की गयी थी जो एकमीघाट, धोईघाट, जीवछघाट से होते हुये काकरघाटी तक गयी।

लेखक एवं पृथ्वी अधिकार कार्यकर्ता डॉ. जावैद अब्दुल्लाह ने नदियों की रिपोर्ट में बताया कि नदियों का हाल बहुत भयावह है। नदियाँ अब सूखने के साथ अपने नदी होने की पहचान भी खो रही हैं। कहीं तो स्थिति यह है कि नदी है नाला है या नहर? इनमें फ़र्क़ करना मुश्किल हो रहा है। कहीं नदी नदी नहीं चटियल मैदान लगती है और कहीं-कहीं खोजना मुश्किल है कि यहाँ पर नदी कहाँ है? बाग़मती नदी में नाम मात्र पानी है किन्तु हर जगह नहीं। वहीं कमला नदी बिल्कुल सूख चुकी है। केवल झंझारपुर की एक धार को छोड़कर इसकी अन्य सभी शाखाओं का यही हाल है। साल 1987 के बाढ़ के बाद से ही कमला की लगभग सभी धारों का मुँह बन्द कर दिया गया। सूखी नदियों की पदयात्रा का अनुभव इससे भी बेहद दुःखद और अशुभनीय है। सूखी नदियाँ अब मल-मूत्र त्यागने का स्थान बनती रही है। धोईघाट, गौंसा, एकमीघाट हर जगह ये शमशानघाट के लिये इस्तेमाल होने लगी हैं, पूछने पर स्थानीय लोगों ने बताया गया कि ये तो वर्षों-वर्षों से हो रहा है, बल्कि एकमीघाट और धोईघाट के देवारी में इसके लिये शेड भी बना हुआ है। और सुनिये, नियम है कि किसी भी वाटर बॉडी (नदी, झील) के निकट कोई कंस्ट्रशन वर्क नहीं कर सकते। लेकिन तालाब के साथ इन सूखी नदियों के किनारे भी जिस किसी को जहाँ मौक़ा मिल रहा है घर और भवन बना रहा है, बल्कि स्कूल भी। गंगा के लिये तटबन्ध से 200 मीटर और अन्य नदियों के लिये 100 मीटर में कोई भवन निर्माण नहीं किया जा सकता। लेकिन यह सब हो रहा है। नदी संरक्षण को लेकर सरकार और हमारा समाज दोनों बिल्कुल चिन्तामुक्त हैं। जो थोड़ी बहुत छटपटाहट दिखती भी है, वह कार्यकर्ताओं के आयोजन और ख़बरें बनने तक सीमित है। रेमन मैगसेसे सम्मानित जलपुरुष राजेन्द्र सिंह से फ़रवरी 2020 में जब मैंने इंटरव्यू लिया था तो उन्होंने उसमें स्पष्ट कहा था, रीवर (नदी) और सीवर (गटर) दोनों को अलग रखने की ज़रुरत है। उनका उद्देश्य साफ़ पानी और गन्दे पानी को अलग रखने से था यानि नदी को गन्दा नहीं करने से था। लेकिन नदियाँ गन्दगी फैलाने का अड्डा बन रही हैं। तालाब बचाओ अभियान के नारायण जी चौधरी बताते हैं कि नदियों की यह जो हालत हुई है उसे तीन-चार स्तर से देख सकते हैं। लेकिन मूल कारण यही है कि सरकार के पास कोई ठोस पॉलिसी और सिस्टम नहीं है जिसके चलते सरकारी, प्रशासनिक, लोग और समाज; हर स्तर भी इन सूखी नदियों और उसकी ऐसी स्थितियों का ज़िम्मेदार है। नदी सत्याग्रह के अंतर्गत ‘नदी किनारे नदी पर संवाद’ कार्यक्रम में सूखी नदियों पर चर्चा की गयी। कमला नदी के मुँह के सभी धारों को फिर से खोलने के प्रयास पर विचार किया गया। स्थानीय लोगों ने कहा कि कमला और जीवछ नदी क फिर से पुनर्जीवित किया जाए।

डब्ल्यूएनडी के अध्यक्ष, लेखक व पृथ्वी अधिकार कार्यकर्ता डॉ. जावैद अब्दुल्लाह ने गम्भीर चिन्ता जताते हुये कहा कि ‘नदियों के हाल पर देश के नेता बेख़बर हैं, लोगों को करना होगा जन-आंदोलन। वनस्पति वैज्ञानिक प्रो. विद्यानाथ झा ने स्थानीय लोगों से बात की। स्थानीय निवासी कर्पूरी ठाकुर ने उन्हें जानकारी देते हुये बताया कि दो महीना पहले संजय कुमार झा (बिहार सरकार जल संसाधन मंत्री) ने कहा कि कमला में कम से कम 4.5 फीट पानी सालों भर बहना चाहिए। तालाब बचाओ अभियान के नारायण जी चौधरी ने भी नदियों पर गम्भीर चिन्ता व्यक्त की और लोगों से नदी संवाद क़ायम किया। उन्हें वरिष्ठ लोगों ने उन्हें बताया कि 1987 के पहले दरभंगा की कमला नदी में डॉल्फिन (सूंस) मछली को अठखेलियाँ करते हुये देखा जा सकता था। वहीं 1972 से पूर्व इसमें नाव चला करती थी। जिसमें कुर्सेला (पूर्णिया) से व्यापारी लोग मक्का लाते थे और यहाँ नाव से उतारकर मुज़फ्फरपुर भेजा जाता था। यहाँ के लिये एक सुगम यातातात था लेकिन आज नदियों का पीट ख़ाली है। कमला नदी अपने इतिहास में जहाँ केवल कार्तिक पूर्णिमा और माघ पूर्णिमा में मेला लगता था और मिथिलांचल के लिये यह एक धार्मिक तीर्थ भी माना जाता रहा, वो नदी आज पानी को तरस रही है। इस अवसर पर लवली युनिवर्सिटी के बी-टेक द्वीतीय वर्ष के छात्र आयुष रंजन, पियूष रंजन, दीपक कुमार, आकाश, सक़लैन अहमद आदि उपस्थित थे। स्थानीय लोगों में विनोद गिरी, प्रमोद देवी (पुजारिन), मदन पुजारी, जगदीश राम, रघुवंशी यादव (कबरिया) आदि ने भी अपने विचार प्रकट किये। संवाद के बाद भी नदी सत्याग्रह की छोटी सी पदयात्रा भी निकाली गयी।












