-चाइना पर निर्भरता कमेगी,अब बिहार में भी सीप से मोती बनाने का काम शुरू।
मुजफ्फरपुर(बिहार)। दीपक कुमार तिवारी ।
अब मोती के लिए हमें विदेश के उत्पादकता और चाइना पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। बिहार में भी मोती उत्पादन का प्रयोग शुरू किया गया है। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो इसकी व्यापक उत्पादकता संभव हो सकेगी। शिप से मोती उत्पादन के कार्यों की शुरुआत बिहार के मुजफ्फरपुर और पटना से की गई है। मुजफ्फरपुर जिले के बन्दरा प्रखंड के मतलूपुर स्थित कोरलाहा में डेमो प्रोजेक्ट के तहत इसकी शुरुआत की गई है। एक पोखर में तकरीबन 5 हजार मोती बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। हैदराबाद की एक कंपनी के द्वारा इसका प्रयोग(ट्रायल)शुरू किया गया है। वही राजधानी पटना के मसौढ़ी प्रखण्ड के नौबतपुर में 1000 मोती तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। कंपनी के सीनियर जीएम(सेल्स) मनीष कुमार ने बताया की शिप से मोती बनाने का यह प्रयोग किया जा रहा है।इसके लिए शिप दूसरे प्रदेशों से मंगाए गए हैं। शिप के अंदर प्रोसेसिंग कर उसे जाल के अंदर व्यवस्थित करके जल भरे पोखर के अंदर डाला जाता है। तकरीबन साल भर में यह मोती के रूप में विकसित हो जाता है।


यूपी के हरिद्वार से आए एक्पर्ट ब्रजेश यादव ने बताया कि सर्जरी के माध्यम से जिंदा शिप के अंदर कवच एवं मसल्स के बीच में बड़ी सतर्कता से न्यूक्लियस डाले जाते हैं। वह विभिन्न आकृतियों में है। एक शिप से मोती तैयार होने में 12से 13 महीने का वक्त लगता है। उन्होंने बताया कि इस अवधि में शिप का स्वस्थ्य रहना जरूरी है। बीमार होने की स्थिति में उत्पादन प्रभावित हो सकती है। कम्पनी के प्रतिनिधि मनीष कुमार ने बताया कि मोती दो प्रकार के होते हैं। एक डिजाइनर मोती होती है। जो आभूषणों में प्रयोग होते हैं और दूसरा गोल मोती होते हैं। उन्होंने बताया कि पहले डिजाइनर मोती उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया। पहला प्रयोग एक पोखर में शुरू किया गया है। जिसमें 5000शिप से मोती उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। वहीं पटना वाले प्रोजेक्ट स्थल पर 1000शिप से मोती निर्माण करने का लक्ष्य तय किया गया। उन्होंने बताया कि तकरीबन 1000 शिप-मोती तैयार करने में 40से 45हज़ार रुपए का लागत पूंजी आता है। जिससे मोती उत्पादन करने के बाद तकरीबन 80से 90हज़ार रुपए में आसानी से बेचा जा सकता है। इन मोतियों को बाद में डिजाइनर अपने हिसाब से विभिन्न प्रकार के आभूषणों में बदल देते हैं।फिर इसकी कीमत बढ़ती चली जाती है। चूंकि मोती रत्ती के अनुसार बिकता है।लिहाजा साइजों के अनुसार इसकी कीमत कम या ज्यादा होती है। उन्होंने बताया कि शिप में फीडिंग के लिए यूपी से एक्सपर्ट को लाया गया है जो इसका फीडिंग करते हैं और बाद में जाल में व्यवस्थित करके उसे पोखर के अंदर डाला जाता है।न्यूक्लियस से इसे उत्पादित किया जाता है। उन्होंने बताया कि जिंदा शिपों को बाहर से खरीद कर मंगाई गयी है।लोकल नदी-तालाबों के शिप इसके उपयोगी नहीं होते हैं। एक सीप में दोनों तरफ से दो मोती उत्पादन किया जाना संभव है। उन्होंने बताया कि चूंकि मिथिलांचल का इलाका मछली उत्पादन और पोखर के लिए प्रसिद्ध है। लिहाजा यहां यदि यह प्रयोग सफल होता है तो मैं मिथिलांचल के क्षेत्र में लोग मछली पालन के साथ हीं मोती उत्पादन भी कर सकेंगे और ससमय डिमांड के अनुसार इसकी व्यापक उत्पादन होगी।इससे उत्पादक किसानों को बेहतर आमदनी हो सकेगी। उन्होंने बताया कि डिजाइनर मोती में भगवान एवं अल्लाह आदि सभी प्रकार के आकृति में मोती उत्पादन संभव होती है।
















