#गांव
देखो ना मेरा गांव खो गया,
वह प्यारा सा ठांव खो गया।
पगडंडी अब बनी सड़क है,
मिट्टी नहीं, कंक्रीट कड़क है।
हरीयाली लुट गयी है सारी,
संस्कृति कहीं घुट गयी हमारी।
सच में मेरा गांव खो गया…….।

अब गायें कहीं नहीं रम्भाती,
ना फूलों से वो खुशबू आती।
ना बेफिकरा बचपन दिखता,
ना अल्हड़ नवयौवना मदमाती।
मानो एक इतिहास खो गया,
सच में मेरा गांव खो गया ……..।
अब ना छाछ, दही ना माखन,
ना हरखू, झूरी और लाखन।
ना माटी की महक वो सौंधी,
लकड़ी चूल्हा, तसली औंधी।
हाय! कागा का कांव खो गया।
सच में मेरा गांव खो गया……।.
अब ना पायल रुनझुन बजती,
ना दुल्हन वो छुनमुन सजती।
मेंहदी तोड़ रही अब दम है,
आलता-महावर भी बेदम है।
जाने कैसा भाव हो गया?
सच में मेरा गांव खो गया…….।















