-रील्स का जानलेवा जुनून: उत्तर बिहार में 48 माह में 22 से अधिक युवाओं की गई जान, पुलिस ने जारी की चेतावनी
मुजफ्फरपुर। सोशल मीडिया पर रातों-रात लोकप्रिय होने की चाहत अब युवाओं के लिए जानलेवा साबित हो रही है। उत्तर बिहार के कई जिलों में रील बनाने के दौरान चलती ट्रेन, नदी, पुल और हाईवे पर स्टंट करने जैसी खतरनाक गतिविधियों के कारण पिछले 48 महीनों में 22 से अधिक युवाओं की मौत हो चुकी है। मुजफ्फरपुर, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण, समस्तीपुर, दरभंगा, सीतामढ़ी, मधुबनी और रक्सौल सहित कई क्षेत्रों में ऐसे हादसे लगातार सामने आए हैं।
हाल के वर्षों में कई दर्दनाक घटनाओं ने इस बढ़ते खतरे की ओर ध्यान खींचा है। जनवरी 2026 में पश्चिमी चंपारण के साठी स्टेशन के पास अमृत भारत एक्सप्रेस की चपेट में आने से दो युवकों की मौत हो गई थी। इसी तरह समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी और अन्य जिलों में भी रेलवे ट्रैक, पुल और सड़कों पर रील बनाने के दौरान कई युवाओं ने अपनी जान गंवाई।
मनोचिकित्सक डॉ. ए.के. झा के अनुसार, सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स और हार्ट इमोजी मस्तिष्क में डोपामाइन का स्राव बढ़ाते हैं, जिससे युवाओं में बार-बार जोखिम उठाने की प्रवृत्ति विकसित हो सकती है। उन्होंने कहा कि अधिक लाइक्स पाने की चाह में कई युवा खतरे को नजरअंदाज कर देते हैं और यही मानसिकता हादसों का कारण बनती है।

साइबर विशेषज्ञ एवं अधिवक्ता अनिकेत पीयूष ने युवाओं को सोशल मीडिया से समय-समय पर दूरी बनाने, जोखिम भरे स्थानों पर वीडियो न बनाने और खेल, संगीत तथा अन्य रचनात्मक गतिविधियों में समय देने की सलाह दी। उनका कहना है कि कुछ सेकंड की ऑनलाइन लोकप्रियता के लिए जीवन को खतरे में डालना उचित नहीं है।
मुजफ्फरपुर में भी सार्वजनिक स्थानों पर रील बनाने के कई चर्चित मामले सामने आ चुके हैं। सिटी पार्क में हथियार जैसी दिखने वाली वस्तु के साथ वीडियो, कचहरी परिसर में पेशी के दौरान रील, पुलिस वाहन में वीडियो और हाईस्पीड बाइक पर स्टंट जैसे मामलों में पुलिस कार्रवाई कर चुकी है। पताही एयरपोर्ट, संगम घाट रेलवे पुल, अखाड़ाघाट पुल, न्यू बाइपास, सिटी पार्क तथा फोरलेन सड़कों को रील बनाने के लिहाज से संवेदनशील स्थान माना जा रहा है।
मुजफ्फरपुर के एसएसपी कांतेश कुमार मिश्रा ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों, रेलवे ट्रैक, पुलों और सड़कों पर जान जोखिम में डालकर वीडियो बनाने वालों पर पुलिस की कड़ी नजर है। ऐसे मामलों में वीडियो हटाने के साथ-साथ सार्वजनिक उपद्रव और जान जोखिम में डालने से संबंधित कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई की जाएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि अभिभावकों को बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए, घर में मोबाइल उपयोग के लिए अनुशासन तय करना चाहिए और सोशल मीडिया की बजाय वास्तविक जीवन की उपलब्धियों को प्रोत्साहित करना चाहिए। उनका मानना है कि समय रहते जागरूकता और सतर्कता ही इस बढ़ते डिजिटल खतरे को कम कर सकती है।












