-मिथिला के लोक साहित्य के संरक्षण की जरूरत, युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा: बिक्रम यादव
दरभंगा/जनकपुरधाम। अखिल भारतीय साहित्य न्यास की ओर से दरभंगा स्थित मखाना अनुसंधान केंद्र के सभागार में आयोजित ‘प्री लोक मंथन (हम भारत के लोग)’ कार्यक्रम में वक्ताओं ने मिथिला की समृद्ध लोक संस्कृति और लोक साहित्य के संरक्षण पर जोर दिया।
कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि कमला पुत्र बिक्रम यादव ने कहा कि मिथिला का लोक साहित्य आज विलुप्ति के कगार पर है, जिसे बचाने के लिए समाज को सामूहिक प्रयास करने होंगे। उन्होंने कहा कि लोक साहित्य में लोककथाएं, लोकगाथाएं, किस्से, पहेलियां और फखरा जैसी समृद्ध परंपराएं शामिल हैं। राजा सलहेस, दीना-भद्री, बंठा चमार और कारिख महाराज जैसे लोकनायकों की गाथाएं हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं, जिन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।
उन्होंने चिंता जताई कि शीत-बसंत, आल्हा-ऊदल, कुंबर बृजभान नाच, झिझिया, जट-जटिन और डोमकच जैसे पारंपरिक लोकनृत्य धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। वहीं प्राती, चैता, महराई, कारिख महाराज का झूमर तथा ढोल, पिपही और रसन चौकी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र भी पहचान खो रहे हैं। उन्होंने कहा कि मिथिला की लोक संस्कृति का कमला नदी से गहरा संबंध रहा है और इसके संरक्षण के लिए ठोस पहल की आवश्यकता है।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार ने की। विशिष्ट अतिथि सिया प्यारे शरण (संदीप जी) ने कहा कि लोक साहित्य हमारे पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है, जिसका संरक्षण और संवर्धन समय की मांग है। इस सत्र में राहुल कुमार चौधरी और गौतम कुमार वात्स्यायन ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
द्वितीय सत्र में डॉ. विनोद कुमार हंसौड़ा की अध्यक्षता में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें नैना साहू, स्वतंत्र शांडिल्य, गौरी शंकर साह, आचार्य धीरेन्द्र झा ‘माणिक्य’, भारती रंजन, अनिता तथा बाल कवि कृधा नंदिनी सहित कई कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम का संयोजन अखिल भारतीय साहित्य न्यास, बिहार की महासचिव मीनाक्षी मीनल ने किया। आयोजन में साहित्यकारों, शोधकर्ताओं और सांस्कृतिक प्रेमियों ने बड़ी संख्या में भाग लेकर मिथिला की लोक परंपराओं के संरक्षण का संकल्प लिया।












