-नहीं चली चाणक्य की नीति,जीरो पर आउट हुई प्रशांत की पार्टी
-बिहार उपचुनाव में प्रशांत किशोर का जलवा फीका, -चारों सीटों पर फिसड्डी साबित हुई जन सुराज पार्ट
-बिहार में उपचुनाव जन सुराज की पहली बड़ी परीक्षा
दीपक कुमार तिवारी।पटना।
लोकसभा चुनाव 2024 के बाद बिहार में चार विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव का नतीजा आज (23 नवंबर) आ रहा है। इन सीटों में इमामगंज, बेलागंज, तरारी और रामगढ़ शामिल हैं। इस उपचुनाव की खासियत यह रही कि पहली बार प्रशांत किशोर की नवगठित पार्टी जन सुराज ने भी अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे। प्रशांत किशोर, जो अब तक चुनावी रणनीति के महारथी माने जाते रहे हैं, इस बार खुद राजनीति के मैदान में उतरे। लेकिन सुबह 11 बजे तक के रुझानों ने जन सुराज की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
चारों सीटों पर जन सुराज तीसरे स्थान पर:
चारों सीटों पर जन सुराज के उम्मीदवार रेस में पिछड़ते नजर आ रहे हैं। हालांकि, इमामगंज से उनके प्रत्याशी जितेंद्र पासवान ने शुरुआत में कुछ टक्कर दी, लेकिन वह भी तीसरे स्थान से आगे नहीं बढ़ सके।
इमामगंज:
जितेंद्र पासवान, जिन्हें प्रशांत किशोर ने डॉक्टर और समाजसेवी के रूप में पेश किया था, नौवें राउंड तक 28,025 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे। इस सीट पर मुकाबला महागठबंधन और बीजेपी के बीच सिमट गया है।
बेलागंज:
यहां जन सुराज के प्रत्याशी मोहम्मद अमजद को छठे राउंड तक 10,162 वोट ही मिले हैं। यह सीट भी महागठबंधन के खाते में जाती दिख रही है।
तरारी:
इस सीट पर जन सुराज की उम्मीदवार किरण देवी पांचवें राउंड तक सिर्फ 2,512 वोट ही जुटा पाईं। यहां बीजेपी के विशाल प्रशांत सबसे आगे हैं, जिन्हें 34,932 वोट मिले हैं।
रामगढ़:
रामगढ़ सीट पर जन सुराज के सुशील कुमार सिंह पांचवें राउंड तक मात्र 1,880 वोट पाकर मुकाबले से बाहर हो गए हैं। यहां बीएसपी के सतीश कुमार सिंह यादव बढ़त बनाए हुए हैं।

प्रशांत किशोर की रणनीति क्यों नहीं चली?
प्रशांत किशोर, जिन्होंने कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के लिए चुनावी रणनीति बनाई और सफलता दिलाई, इस बार अपनी पार्टी के साथ मैदान में थे। जन सुराज पार्टी का गठन उन्होंने 2 अक्टूबर 2024 को किया था, दो साल की लंबी पदयात्रा के बाद। लेकिन उनकी पार्टी जनता के दिलों में जगह बनाने में नाकाम रही।
विश्लेषकों का मानना है कि:
जन सुराज पार्टी का संगठन अभी मजबूत नहीं है।
पार्टी का प्रचार अपेक्षाकृत कमजोर रहा।
स्थानीय मुद्दों को उठाने में प्रशांत किशोर की पार्टी अन्य दलों से पीछे रही।
क्या आगे की राजनीति पर असर पड़ेगा?
प्रशांत किशोर के लिए यह उपचुनाव एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। उनके दावों के बावजूद पार्टी को चारों सीटों पर हार का सामना करना पड़ता दिख रहा है। हालांकि, यह उनकी पार्टी की पहली बड़ी परीक्षा थी, और प्रशांत किशोर भविष्य में इससे सबक लेकर आगे की रणनीति बना सकते हैं।
क्या प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में टिक पाएंगे?
इस उपचुनाव में प्रशांत किशोर की रणनीति भले ही सफल न रही हो, लेकिन यह उनकी राजनीतिक यात्रा का अंत नहीं है। वे अगले विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए नई रणनीति के साथ सामने आ सकते हैं। बिहार की राजनीति में टिकने के लिए उन्हें अपनी नीतियों और संगठन को बेहतर बनाने की जरूरत होगी।
प्रशांत किशोर की पार्टी के लिए बिहार उपचुनाव एक कड़ा इम्तिहान साबित हुआ है। हालांकि यह उनकी शुरुआती राजनीतिक यात्रा है, लेकिन फिलहाल जनता का भरोसा जीतने में वह नाकाम रहे हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशांत किशोर अपनी रणनीति में क्या बदलाव करते हैं और कैसे बिहार की राजनीति में अपनी पार्टी को मजबूत बनाते हैं।












