-उपचुनाव में लालू यादव की विरासत को लगी नजर!
-झटका देगा रामगढ़ और बेलागंज सीट का रिजल्ट
ब्यूरो। पटना।
लगभग दलों में परिवारवाद का मुद्दा उनकी नजर में गंभीर मुद्दा नहीं रह गया। ऐसा इसलिए कि लगभग दल परिवारवाद के दलदल में देर सवेर प्रमुख दल फंसते रहे। और इसका बड़ा ही सटीक उदाहरण बिहार में हुए चार विधानसभा उप चुनाव बन गया है, जहां लगभग प्रमुख दलों ने अपने परिवार के सदस्यों को चुनावी जंग में उतरा था। पर स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी और राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चा के बाद ये तथ्य सामने आया कि जनता विरासत की राजनीति से ऊब चुकी है। जिसका रिफ्लेक्शन रामगढ़ और बेलागंज विधानसभा उप चुनाव में दिखने जा रहा है। कहा तो जा रहा है कि इस उपचुनाव में राजद के दो किले पर ध्वस्त होने का खतरा मंडरा रहा है।

रामगढ़ विधानसभा उप चुनाव त्रिकोणात्मक संघर्ष में फंस चुका है। राजद के उम्मीदवार अजीत सिंह, भाजपा के उम्मीदवार अशोक सिंह और बसपा के उम्मीदवार पिंटू यादव के बीच मुकाबला है। रामगढ़ में जातीय जकड़न के साथ चुनाव तो हो रहा है पर यहां ‘MY’ समीकरण ध्वस्त हो चुका है। इसके आधार में शामिल है विरासत की राजनीति। रामगढ़ विधानसभा उप चुनाव में विरासत की राजनीति का जबरदस्त विरोध दिखा। ऐसा इसलिए कि पहले रामगढ़ से जगदानंद सिंह जीतते आए। बीच में एक बार अंबिका यादव चुनाव जीते।
दलित वोट पर राजद की जो पकड़ थी वह भी बसपा की तरफ जाते दिखा। रामगढ़ में राजद के उम्मीदवार अजीत सिंह के लिए राजपूत मत जो जीत का बड़ा हकदार बना करता था। उस वोट में भी राजपूत जाति से आने वाले भाजपा उम्मीदवार ने सेंधमारी कर अपने हक में अच्छा मत पाने की कोशिश को अंजाम दिया। और वैसे भी वर्ष 2020 के विधानसभा में राजद उम्मीदवार सुधाकर सिंह की जीत कुछ सौ मतों से हुई थी। और इस बार रामगढ़ का चुनावी जंग नए अंदाज का गवाह बनने जा रहा है। जहां विरासत की राजनीति पर बड़ा सा प्रश्न चिन्ह खड़ा दिखने लगा है।
बेलागंज विधानसभा उप चुनाव पर भी विरासत की राजनीति पर खतरा मंडराने लगा है। बेलागंज से लगातार सात बार जीत कर विधायक और कई बार मंत्री बनने वाले सुरेंद्र यादव जब 2024 की लोकसभा चुनाव के दौरान सांसद बन गए तो बेलागंज से विधायकी चली गई। यहां पर लगभग तीन दशक से बेलागंज में राज कर रहे सुरेंद्र यादव जब दिल्ली सांसद बन कर चले गए तो राजद में उम्मीद थी कि इस बार राजद क्षेत्र के सक्रिय कार्यकर्ता को टिकट देगी। लेकिन राजद ने जब विरासत की राजनीति का साथ देते सुरेंद्र यादव के पुत्र विश्वनाथ यादव को टिकट दिया तो क्षेत्र के राजद कार्यकर्ताओं में काफी आक्रोश देखने को मिला।
यह आक्रोश ‘MY’ के बिखराव के रूप में उभरा। इसकी गूंज लालू यादव के कानों तक पहुंची तो अंतिम दिन लालू यादव ने कमान संभाली। बेलागंज में राजद को कई तरफा विरोध का सामना करना पड़ा। सबसे ज्यादा मुस्लिम मतों के विभाजन का खतरा मंडरा रहा था। मुस्लिम मत के हकदार के रूप में जनसुराज के मो. अमजद तो थे ही उस पर ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार जमीन अली खान भी। इधर यादव जाति से आने वाली मनोरमा देवी यादव मत में सेंधमारी की। इससे बेलागंज में राजद उम्मीदवार विश्वनाथ यादव को मुस्लिम और यादव मतों से काफी मतों के बिखरने का सामना करना पड़ा।
मुस्लिम मतों की जनसंख्या जहां 67 हजार के करीब है। वहीं यादव की संख्या लगभग 70 हजार है। इन मतों के बिखराव राजद किले के ध्वस्त होने के सबसे बड़ा कारण बनने जा रहा है। जहां तक मुस्लिम मतों का सवाल है, तो वह अभी भी दावों में जनसुराज और राजद के बीच बटता नजर आ रहा है। वहीं यादव मतों के मूल रूप से दो दावेदार हैं। राजद के विश्वनाथ यादव का भरोसा यादव मतों पर ज्यादा है तो जदयू की मनोरमा देवी भी राजद के वर्चस्व को तोड़ने का दावा कर रही है।











