-शास्त्रीजी की मौत का सच: अनुत्तरित
(निजी उद्गार! स्रोत- विभिन्न संबंधित किताबें। समय मिले तो आप से गुजारिश है कि इसे अवश्य पढ़ें।)
अक्सर यह सवाल भारत भूमि पर उठाए जाते हैं कि हमारे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की संदिग्धावस्था में मृत्यु का कारण क्या था?
शायद भारतीय सेना की ताकत का पाकिस्तान तथा तत्कालीन तथाकथित मौकापरस्त सहयोगी अमेरिका को एहसास नहीं था और इसी वजह से पाकिस्तान ने भारत पर अप्रत्याशित रूप से 1965 में आक्रमण कर दिया जिसका मुँहतोड़ जवाब देते हुए भारतीय सेना ने लाहौर तक कब्जा कर लिया जिसके कारण अपने नागरिकों को निकालने के नाम पर अमेरिका ने युद्ध विराम की शास्त्रीजी से गुहार लगाई। फिर रूस और अमेरिका की मध्यस्थता में तत्कालीन रूस के उज्बेकिस्तान में 10 जनवरी 1966 को *ताशकंद समझौता* के लिए बैठक आहूत की गई और फिर महज 12 घंटे बाद 11 जनवरी 1966 को शास्त्रीजी की मौत हो गई जो आजतक रहस्य है।
कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय दवाब में समझौता तो हुआ परन्तु शास्त्रीजी पाकिस्तान के जीते हुए भाग को लौटाने को तैयार नहीं हुए और फिर 11जनवरी 1966 की उसी काली रात को शास्त्रीजी की संदिग्ध अवस्था में मौत हो गई जिस रहस्य पर पर्दा आजतक पड़ा हुआ है।
जब भारत के प्रधानमंत्री की विदेशी दौरे में संदिग्धावस्था में मौत हो जाती है,शरीर नीला पड़ जाता है और शरीर में उजले धब्बे निकल जाते हैं जो तथाकथित *हार्ट अटैक* का लक्षण नहीं है और फिर उनका पोस्टमार्टम न होना तथा जाँच के लिए गठित समिति में उनके निजी डाक्टर आर एन सिंह और निजी सहायक रामनाथ की संदिग्ध मौत निश्चित रूप से सवाल तो खड़ा कर मौत पर संशय तो बढ़ाता ही है।ध्यान रहे उस रात उनका भोजन उनके निजी सहायक रामनाथ ने नहीं बल्कि तत्कालीन रूस में भारतीय राजदूत टी एन कौल का रसोईया जान मोहम्मद ने बनाया था जिसे खाकर शास्त्रीजी अपने कमरे में गए थे ।शरीर का नीला पड़ने के कारण खाना में जहर की बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता। कोई क्या कुछ कह और कर सकता है जब उनका कोई दस्तावेज नहीं है।
डेलिगेशन का एक सक्रिय सदस्य लेखक कुलदीप नैय्यर की किताब *बियोंड द लाइन* में लिखे शब्द कुछ हास्यास्पद लगते हैं जब वो कहते हैं कि शास्त्री जी ने अपनी पत्नी से बातें करनी चाही पर उन्होंने बातें नहीं की, यह कहकर कि यह समझौता सम्मान के विरुद्ध था।साथ ही इसमें उन्होंने अटल बिहारी बाजपेई तथा कृष्ण मेनन का भी नाम घसीटा कि नेता द्वय ने शास्त्री जी के फैसले का विरोध किया है।यह उनके लिए एक सदमा की तरह था और फिर—

शक की सुई बार बार स्वाभाविक मौत नहीं बल्कि एक साजिश की ओर संकेत करता है।
शांतिवन नेहरूजी की समाधि के सामने विजय घाट पर स्थित उनकी समाधि की दृष्टि शायद आज भी देश के अग्रिम पंक्ति के वाहकों को संदिग्ध भाव से देखता है जब वह पुण्यतिथि को उनके उपर पुष्प अर्पित करने जाते हैं।
लिखने को बहुत कुछ हैं।समझौता और उसका स्वरूप। परन्तु यह सब बातें तो कई जगह मिल जाएंगे परन्तु आज उनके पुण्यतिथि पर मेरे हृदय में जो उनके लिए सवाल उठ रहे थे बस अपने मित्रों तथा पाठकों को बताने की कोशिश की है जो अनुत्तरित हैं।
भारत के सहज सरल, दूरद्रष्टा, जय जवान, जय किसान जैसे नारा का उद्घोषक पूर्व व परम प्रिय प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर उन्हें सहृदय श्रद्धासुमन अर्पित करता हूँ।
भारत को सदा मलाल रह गया। उनकी मौत का सच रहस्यमय ही रह गया। हम समझ सकते हैं कि विदेशियों को उनकी प्रतिभा का एहसास था और हो सकता है कि ईर्ष्यावश कुछ भी कर सके थे। अत: आकस्मिक मौत न होकर अन्य कुछ और भी हो सकता है । परंतु भारत के तत्कालीन भाग्यविधाता को ऐसे अद्भुत व्यक्तित्व से क्या दुश्मनी थी कि मौत के रहस्य से पर्दा हटाने की किसी ने भी कोई कोशिश नहीं की। जो भी हो उनका व्यक्तित्व व कृतित्व को अमरत्व प्राप्त है। इसी घटनाक्रम से संबंधित मेरे दो शब्द:-
*शास्त्री जी की मौत का सच : अनुत्तरित*
क्या था उनकी मौत का सच;
पूर्व सरकार क्यों रही थी बच?
उनकी मौत का रहा मलाल;
आजतक उठता रहा सवाल।
कद छोटा पर दिल था बड़ा;
देश के लिए सदा था खड़ा;
दवाब बड़ा था समझौता का;
पर अंत तक बस रहा अड़ा।
यह हत्या थी या आत्महत्या;
या था कुछ दिल का आघात;
देश ने क्या खोया क्या पाया;
आजतक कर रहा पश्चाताप।
यह हत्या थी या थी साजिश;
जानने की उठती है ख्वाहिश;
पर दस्तावेज कहां है सुबोध?
कैसे करे बस कोई आजमाइश?
साभार:- डॉ.नर्मदेश्वर मुज़फ़्फ़रपुरी















