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तीन राज्यों में कांग्रेस की हार लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के प्रचंड जीत की आहट

-तीन राज्यों में कांग्रेस की हार लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के प्रचंड जीत की आहट __________________
निश्चिंत रूप से आज के परिदृश्य में यह बात हास्यास्पद लगे लेकिन इतिहास इन बातों की गवाही देता है। सन 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार और जनता पार्टी की जीत के बाद सन 1980 में पुनः कांग्रेस पार्टी की प्रचंड बहुमत से जीत इसका उदाहरण हैं।
पीछले कुछ दिनों से जब देश भर में विपक्षी एकता को लेकर सर्वप्रथम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आभियान छेड़ा तो देश के सभी विपक्षी दलों ने इस आभियान का स्वागत किया। कई दौर की वार्ता के बाद लगभग सभी दलों ने इंडिया मोर्चा बना कर नरेंद्र मोदी की सत्ता को चुनौती देते हुए भाजपा और एन डी ए खेमे में दशहत कायम कर दिया। देश के तमाम सामाजवादी, वामपंथी एवम लोकतंत्र में आस्था रखने वाले सभी दल आपसी वैमनस्यता को भूल कर एक मंच पर आने को राजी हो गए। पहली बार बंगाल में ममता बनर्जी और वामपंथी दल भी एक मंच पर आए। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की जोड़ी ने सबका विश्वास भी हासिल कर लिया।
परंतु एन वक्त पर जब इंडिया गठबंधन के स्वरूप के विस्तार का समय आया,तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो आभियान की सफलता ने इसमें अवरोध पैदा कर दिया। लाखों लोगों की भीड़ राहुल गांधी के साथ चलने के कारण कांग्रेस नेता अति उत्साही हो गई। कांग्रेस पार्टी चालाकी से नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन में उपेक्षित करने तथा गठबंधन का कॉनवेनर बनाने से इनकार कर दिया। कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम ने आग में घी डालने का काम किया।224 सीटों में कांग्रेस पार्टी ने 135 सीटों पर जीत दर्ज कर ऐतिहासिक सफलता पाई। कांग्रेस पार्टी के चालाक रणनीतिकारों ने राहुल गांधी को पथ से दिग्भ्रमित कर दिया। कांग्रेस नेता ने नया प्रयोग करते हुए इंडिया गठबंधन के अस्तित्व को नकार कर एकला चलो की रणनीति और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की मंशा के तहत पांच राज्यों के चुनाव में अकेले चुनाव लड़ा। अखिलेश यादव, नीतीश कुमार जैसे नेताओं से सीट शेयरिंग पर चर्चा करना भी राहुल गांधी और कांग्रेस के चालाक रणनीतिकारों को नागवार गुजरा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जातीय और आर्थिक गणना जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को हाइजैक कर राहुल गांधी ने इसे कांग्रेस के घोषणा पत्र में जोड़ा।


लेकिन अंततः कांग्रेस के चालाक रणनीतिकारों की चालाकी नरेंद्र मोदी और अमित शाह की युगलबंदी के आगे धाराशाई हो गई।मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों को गवाना पड़ा।
मेरी निजी राय है कि यह हार लोकसभा चुनाव 2024 में इंडिया गठबंधन के प्रचंड जीत की आहट है। अगर कांग्रेस नेता राहुल गांधी अब भी अपने चतुर रणनीतिकारों के जद से बाहर निकल कर इंडिया गठबंधन के अस्तित्व को स्वीकार कर ले तो 2024 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोका जा सकता है।

आलेख: प्रभात किरण, युवा जदयू उपाध्यक्ष, बिहार।