-सभी आदमी सर्वप्रथम मनुष्य-जाति के हैं, इस नाते सभी एक-दूसरे के सम्बंधी हैं : अमन समिति
सभी मनुष्य की सबसे पहले एक ही जाति है, और वह है मनुष्य-जाति। इस नाते सभी मनुष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं या यूं कहें कि एक-दूसरे के सम्बंधी हैं, चाहे किसी को इस बात की समझ हो या न हो, फिर भी यह बात 100% सच है।
मनुष्य जाति के बाद ही कोई धर्म बना या फिर कोई अन्य जाति। हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, यहूदी, पारसी, बौद्ध, जैन, वहाबी या अन्य किसी भी धर्म की उत्पत्ति मनुष्य-जाति की उत्पत्ति के बाद ही हुई। धर्म एवं जातियों की शुरूआत से पहले लम्बे समय तक एक ही जाति चली, वह है मनुष्य-जाति।
भारत के संदर्भ में सबसे पहले त्वचा के रंग के आधार पर वर्ण विभाजन (आर्य एवं अनार्य) का वर्णन मिलता है। उसके बाद कर्म के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र जैसी जातियों के विभाजन का वर्णन मिलता है जो बाद के दिनों में जन्म-आधारित हो गया।
जैसे अभी के समय में संविधान के नियमों के अनुसार कर्म के आधार पर जनता के वोटों के द्वारा नेताओं को चुने जाने का नियम है। पर बहुत जगह ऐसा देखने को मिलता है कि कई कद्दावर नेता अपनी शक्ति का दुरूपयोग करके अपने ही पुत्र अथवा परिजनों को अपनी राजनीतिक विरासत का वारिस बना देते हैं, और अपने इस स्वार्थपूर्ण कार्य को जैसे-तैसे संविधान के ही नियमों का हवाला देकर तर्क-कुतर्क के माध्यम से सही साबित कर देते हैं। नेताओं के इस गलत निर्णय को भी दीन-हीन प्रजा स्वीकार करने को बाध्य है और परिवारवाद से पैदा हुए नेताओं की जय-जयकार करने के लिए भी किसी-न-किसी कारण से मजबूर है। इसी प्रकार प्राचीन भारतीय इतिहास के जमाने में भी कर्म के आधार पर शुरू किया गया जाति विभाजन कुछ ही पीढ़ियों के बाद जन्म-आधारित हो गया।
बाद के समय में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों में भी कई-कई उपजातियां बन गईं। इसके बाद भूमिहार, कायस्थ जैसी भी कई जातियां बनीं जो अपने आप को इन चार मुख्य जातियों से बिल्कुल अलग मानने लगे। कायस्थों ने तो अपना नया देवता भी बना लिया।
उधर काले रंग के कारण अनार्य मान लिए गए आदिवासी समाज के लोग कई सदियों तक इन सारी बातों से अनजान जंगलों में प्रकृति की गोद में पलते-बढ़ते रहे।
जातियों के विभाजन की तरह ही हिन्दू धर्म में शैव, वैष्णव जैसे कई पंथ बन गए। मुसलमान भी सिया और सुन्नी में बंट गए। जैनों में भी श्वेताम्बर और पीताम्बर बन गए।
जैसे-जैसे समय बढ़ता है, लोगों का परिवार बढ़ता है, पिता की 16 बीघा जमीन चार बेटों में 4-4 बीघा बंट जाती है, फिर वही जमीन 16 पोतों में 1-1 बीघा बंट जाती है। फिर 32 परपोतों में आधी-आधी बीघा बंट जाती है। इस तरह समय के साथ-साथ जमीन का विभाजन होता चला जाता है, उसी तरह जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे धर्म और जातियों में भी कभी स्वार्थ, तो कभी विचार, तो कभी मिश्रित कारणों से विभाजन होता चला गया।
वर्तमान समय में किस धर्म में कितनी जातियां हैं, इसका एक अच्छा विवरण बिहार में हुए जातिगत जनगणना सर्वे की रिपोर्ट में देखा जा सकता है। इस सर्वे में कुछ लोग ऐसे भोले-भाले भी मिले जिन्हें अपनी जाति का कुछ ठीक से पता भी नहीं, या फिर कुछ ऐसे लोग मिले जो खुद को जाति जैसे संकीर्ण बंधन में रखना ही नहीं चाहते या जिन्हें अपने किसान होने पर गर्व है, ऐसे कुछ लोगों ने अपनी जाति के कॉलम में खुद को “किसान-जाति” का बताया है।
पर जातियां और धर्म चाहे कितने भी क्यों न हो जाएं, पर यह भी एक हकीकत है कि यह सारा सिलसिला मानव-जाति से शुरू होता है।

इसलिए सभी धर्मों और सभी जातियों को मानते हुए और एक-दूसरे का सम्मान करते हुए इस बात को भी ख्याल में रखना जरूरी है कि शुरूआत कहां से हुई थी। मनुष्य-जाति के विभाजन से ही सभी धर्म, सभी पंथ, सभी जातियां एवं सभी उप-जातियां निकलीं। यह बात हर हमेशा ख्याल में रखना जरूरी है।
साथ ही, यह भी ज़रूरी है कि सभी धर्मों एवं सभी जातियों की रीति-रिवाजों और परम्पराओं में जहां कहीं कुछ खामियां घुस गई हैं, बदलते समय के अनुसार उसे ठीक करते रहना भी जरूरी है। सभी धर्मों एवं सभी जातियों को नए समय की जरूरत के हिसाब से नई रीति-रिवाजों एवं नई परम्पराओं को भी शुरू करना जरूरी है।
इन सबके के साथ ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में मानवतावाद के सिद्धांत को भी प्रचारित एवं प्रसारित करना अत्यन्त जरूरी है। हर मनुष्य एक-दूसरे से सम्बन्धित है, नींव में एक ही जाति का है, इस भावना को मजबूत करने के लिए भी नई रीति-रिवाजों एवं नई परम्पराओं को शुरू करने की जरूरत है।
– धनंजय कुमार सिन्हा
संस्थापक, अमन समिति















