-29.80 करोड़ का मॉडल अस्पताल, फिर भी मरीज बेहाल: मुजफ्फरपुर सदर अस्पताल की बदहाल व्यवस्था पर उठे सवाल
मुजफ्फरपुर: मरीज जब अस्पताल पहुंचते हैं तो उनकी उम्मीद होती है कि उन्हें साफ-सुथरा वातावरण, बेहतर इलाज और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी। लेकिन मुजफ्फरपुर सदर अस्पताल की स्थिति इन उम्मीदों पर खरी उतरती नहीं दिख रही है। करोड़ों रुपये खर्च कर मॉडल अस्पताल के रूप में विकसित किए जाने के बावजूद यहां स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
करीब 29.80 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए गए इस आधुनिक तीन मंजिला अस्पताल को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के उद्देश्य से विकसित किया गया था। अस्पताल में ओपीडी, ऑपरेशन थिएटर, जनरल व प्राइवेट वार्ड, एक्स-रे कक्ष, हाईटेक लॉन्ड्री और भोजनालय जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इसके बावजूद मरीजों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 100 बेड क्षमता वाले इस अस्पताल में औसतन केवल 20 से 30 मरीज ही भर्ती हो रहे हैं, जबकि प्रतिदिन 600 से 800 मरीज ओपीडी में इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। अस्पताल में प्राइवेट वार्ड और आर्थो ऑपरेशन थिएटर अब तक पूरी तरह शुरू नहीं हो सके हैं।
हाल ही में जारी स्वास्थ्य सेवाओं की राज्य स्तरीय समीक्षा में मुजफ्फरपुर को 36वां स्थान मिला, जिसने जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल और गहरे कर दिए हैं।
अस्पताल में वर्तमान में 45 चिकित्सक और 60 पारा मेडिकल कर्मी कार्यरत हैं। इनके वेतन पर हर माह करीब एक से सवा करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। वहीं सफाई व्यवस्था पर 40 से 50 लाख रुपये, बिजली बिल पर चार से पांच लाख रुपये तथा जेनरेटर और अन्य रखरखाव पर भी हर महीने लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके बावजूद अस्पताल सेवाओं को लेकर मरीजों की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।

सूत्रों के अनुसार रोस्टर व्यवस्था का समुचित पालन नहीं होने और भर्ती प्रक्रिया कमजोर होने के कारण बड़ी संख्या में आने वाले मरीजों को भर्ती का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
अस्पताल का ऑक्सीजन प्लांट भी व्यवस्था की बदहाली की कहानी बयां कर रहा है। कोरोना काल में मरीजों को निर्बाध ऑक्सीजन आपूर्ति के उद्देश्य से स्थापित 900 एलपीएम क्षमता वाला ऑक्सीजन प्लांट पिछले करीब तीन वर्षों से बंद पड़ा है। आरोप है कि वर्तमान में इसका उपयोग कर्मियों के विश्राम स्थल के रूप में किया जा रहा है।
बताया गया कि मार्च 2023 में प्लांट संचालन कर रहे टेक्नीशियन का अनुबंध समाप्त होने के बाद उसका नवीकरण नहीं हो पाया, जिसके कारण प्लांट बंद हो गया। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार अब राज्य मुख्यालय की ओर से आउटसोर्सिंग एजेंसी को संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
अस्पताल में हर महीने 200 से 250 ऑक्सीजन सिलिंडरों की खपत हो रही है, जिस पर 40 से 50 हजार रुपये तक खर्च किए जा रहे हैं। अस्पताल कर्मियों का कहना है कि यदि ऑक्सीजन प्लांट दोबारा चालू हो जाए तो मरीजों को पाइपलाइन के माध्यम से सीधे ऑक्सीजन आपूर्ति संभव हो सकेगी और अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी कम होगा।
इधर, सिविल सर्जन डॉ. सुधीर कुमार ने कहा कि मॉडल अस्पताल में लगातार सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। मरीजों की शिकायतों के समाधान की दिशा में कार्रवाई हो रही है तथा हाल के दिनों में एक दर्जन चिकित्सकों और कर्मियों पर कार्रवाई भी की गई है।
हालांकि, करोड़ों की लागत से बने मॉडल अस्पताल की मौजूदा तस्वीर यह सवाल जरूर खड़ा कर रही है कि आधुनिक भवन और संसाधनों के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं में अपेक्षित सुधार आखिर कब दिखाई देगा।












