-लागत से सस्ता पनीर बढ़ा रहा सवाल, असली और नकली के बीच उपभोक्ता परेशान
नई दिल्ली/पटना। पनीर को लेकर उपभोक्ताओं के बीच अविश्वास लगातार बढ़ रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में नकली और मिलावटी पनीर के मामले सामने आने के बाद खाद्य सुरक्षा व्यवस्था और बाजार में बिक रहे पनीर की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मुनाफे के लिए उपभोक्ताओं की सेहत से खिलवाड़ का यह कारोबार अब बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
जानकारों के अनुसार दूध की कीमत के अलावा मजदूरी, ईंधन, परिवहन और अन्य खर्च जोड़ने के बाद असली दूध से पनीर तैयार करने की लागत करीब 300 रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकती है। इसके बावजूद बाजार में 200 से 250 रुपये किलो तक पनीर आसानी से उपलब्ध है। लागत से भी कम कीमत पर पनीर की बिक्री को लेकर सवाल उठता है कि आखिर इतना सस्ता पनीर किस तरह तैयार किया जा रहा है।
बताया जाता है कि कई जगहों पर दूध से तैयार होने वाले पारंपरिक पनीर के स्थान पर वेजिटेबल फैट, स्टार्च, प्लांट प्रोटीन और अन्य गैर-डेयरी उत्पादों से तैयार एनालॉग पनीर का इस्तेमाल किया जा रहा है। असली डेयरी पनीर और ऐसे विकल्पों की लागत में काफी अंतर होने के कारण रेस्टोरेंट, कैटरर्स और अन्य कारोबारियों के लिए यह अधिक मुनाफे वाला विकल्प बन जाता है।

हालांकि एनालॉग पनीर अपने आप में जरूरी नहीं कि असुरक्षित हो, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इसे उपभोक्ताओं को सही जानकारी दिए बिना असली दूध के पनीर के रूप में परोसा या बेचा जाता है। इससे ग्राहक को उत्पाद की वास्तविक प्रकृति और उसकी पौष्टिकता की जानकारी नहीं मिल पाती। वहीं, मिलावटी या हानिकारक रसायनों से तैयार खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए केवल प्रतिबंध और छापेमारी पर्याप्त नहीं होगी। एनालॉग पनीर की पैकेजिंग पर उसके वास्तविक स्वरूप और इस्तेमाल किए गए प्रमुख घटकों की स्पष्ट जानकारी देना अनिवार्य किया जाना चाहिए। साथ ही खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है।
उपभोक्ताओं को भी बेहद कम कीमत पर मिलने वाले पनीर को लेकर सावधान रहने की जरूरत है। बाजार में उत्पाद खरीदते समय पैकेट पर लेबल, सामग्री, निर्माता और अन्य जरूरी जानकारी की जांच करना तथा संदिग्ध खाद्य पदार्थों की शिकायत संबंधित खाद्य सुरक्षा अधिकारियों से करना महत्वपूर्ण है। इससे मिलावट के कारोबार पर अंकुश लगाने और लोगों को सुरक्षित खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।













